330 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
जहां तक यूरोप की नारियों का प्रश्न है, मैं नहीं कह सकता कि वे इस संबंध में भारत में अपनी बहनों से पिछड़ी हुई थीं, लेकिन मुझे पक्का विश्वास है कि जब कभी उनमें से कुछेक को शासनकाल में हस्तक्षेप करने का अवसर मिला उन्होंने उसका पूरा लाभ उठाया।
यदि द्रौपदी के स्थान पर रानी एलिजाबेथ होती तो वह अपने पांचों पतियों को फांसी पर चढ़ा देती जैसाकि उसने अपने अभागे प्रेमी लॉर्ड ऐसेक्स को फांसी पर लटका दिया था। लेकिन मेरी राय में द्रौपदी बिना शासनकला के भी रानी बेस्सी की तुलना में अधिक प्यारी है जो राजनीतिक रूप से शक्तिशाली और धूर्त थी।
यूरोपीय इतिहास की एक और जिस नारी का उल्लेख यहां उपयुक्त हो सकता है वह है आस्ट्रिया की सम्राज्ञी मारिया थेरेसा जो अनेक बच्चों की एक स्नेही मां और योग्य शासक दोनों ही थी और यदि हम यूरोप के प्राचीन इतिहास में जाएं तो बाइजेंटियम की सम्राज्ञी थेरोडोरा जारी का शायद अत्यधिक प्रभावशाली उदाहरण है, जो निम्नतम स्थिति से उठकर सर्वोच्च सŸा तक पहुंची। उसने अपने जीवन की यात्रा वेश्या के रूप में शुरू करके सम्राज्ञी के रूप में खत्म की।
मैं नहीं समझता कि यह भारतीय नारीत्व का एक आदर्श होगा, जैसाकि मैं यह नहीं मानता कि शासनकला नारी की गरिमा में चार चांद लगाती है।
यदि यह सच भी होता कि भारतीय नारियां यूरोप की नारियों से बहुत पहले शासन कला से परिचित थीं, हमारा लेखक स्पष्ट रूप से झांसी की रानी और चांद बीबी के समय से पूर्व अवधि के ऐतिहासिक रूप से प्रामाणिक दृष्टांतों को नहीं खोज पाया जोकि दोनों भारत के इतिहास के अत्यधिक आधुनिक काल से संबंधित हैं।
लेकिन समीक्षाधीन लेख का सर्वाधिक आश्चर्यजनक कथन यह है कि ‘‘लेकिन हाय ऐसा प्रतीत होता है कि यह बौद्ध सिद्धांत था जिसने सर्वप्रथम नारियों को पृष्ठभूमि में धकेला’’।
यह सिद्धांत क्या है, दुर्भाग्यवश इस बारे में विद्ववान लेखक ने कुछ प्रकट नहीं किया है और हालांकि मैंने बौद्ध धर्म ग्रंथों और उनकी शिक्षाओं की जांच की है, मुझे नारियों के बारे में कोई विशेष सिद्धांत नहीं मिला है, केवल सामान्यतः मानव जाति के बारे में उल्लेख मिला है। द् फोर नोबल ट्रुथ्स, द् फार्मूला ऑफ डिपेन्डेन्ट ऑरिजिनेशन, और ऐटफोल्ड पाथ ऑफ लिबरेशन में पुरुष और जारी में कोई भेद नहीं किया गया है।