75. परिशिष्ट-III द केबिनेट मिशन - Page 354

335

सहयोग का सुस्पष्ट रूप क्या होगा यह नई सांविधिक संरचना के निर्माण के दौरान वार्ता का विषय होगा क्योंकि सभी राज्यों के लिए वह एक समान नहीं होगा।

तत्पश्चात् केबिनेट मिशन ने उस हल के स्वरूप की ओर संकेत किया जो सभी पक्षों के अनिवार्य दावों को पूरा कर सकेगा और समस्त भारत के गठन के लिए स्थिर और व्यावहारिक रूप प्रस्तुत करेगा। उसने सिफारिश की कि गठन में निम्न व्यवस्था मूल होनी चाहिएः (1) भारतीय संघ होना चाहिए जिसमें ब्रिटिश भारत और राज्य शामिल होने चाहिए जो निम्न विषयों पर विचार करेंगेः विदेशी मामले, रक्षा और संचार उपर्युक्त विषयों के लिए अपेक्षित विŸा-व्यवस्था करने की शक्ति होनी चाहिए (2) संघ की एक कार्यपालिका और विधायिका होनी चाहिए जिनका गठन ब्रिटिश भारत और राज्यों के प्रतिनिधियों में से होना चाहिए। विधायिका में उठाए जाने वाले प्रमुख सांप्रदायिक मुद्दों के निर्णय के लिए, दोनों प्रमुख समुदायों की उपस्थित और मतदान करने वाले प्रतिनिधियों के बहुमत के साथ-साथ सभी उपस्थित और मतदान करने वाले सदस्यों के बहुमत की आवश्यकता होगी। (3) संघ के विषयों के अलावा समस्त अवशिष्ट शक्तियां प्रांतों में निहित होंगी। (4) संघ को सौंपे गए सभी विषयों और शक्तियों के अतिरिक्त सभी शक्तियां और विषय राज्यों के पास रहेंगे। (5) प्रांतों को कार्यपालिका और विधायिका के साथ ग्रुप सम्मिलित रूप में प्रांतीय विषयों का निर्धारण कर सकता है। (6) संघ और ग्रुपों के गठन में एक उपबंध होना चाहिए जिससे कोई प्रांत अपनी विधान सभा के बहुमत से अपने गठन की शर्तों पर पुनर्विचार के लिए दस वर्षों की प्रारंभिक अवधि के पश्चात् और तत्पश्चात् दस वर्षों के अंतराल पर मांग कर सकता है।

केबिनेट मिशन ने निम्नलिखित संविधान निर्माण तंत्र का प्रस्ताव किया ताकि नया संविधान तैयार किया जा सके। नई संवैधानिक संरचना का निर्णय करने के लिए किसी सभा के गठन में, प्रथम समस्या संपूर्ण जनसंख्या का यथा संभव व्यापक और सही प्रतिनिधित्व प्राप्त करना था। स्पष्ट रूप से इसके लिए वयस्क मताधिकार आधारित निर्वाचन अत्यधिक संतोषजनक पद्धति होगी, परंतु ऐसा करने के लिए शुरू की गई कार्रवाई नए संविधान के निर्माण में पूर्णतया अस्वीकार्य विलंब पैदा करेगी ऐसी परिस्थिति में एक ही व्यावहारिक रास्ता यह होगा कि हाल ही में निर्वाचित प्रांतीय विधान सभाओं को निर्वाचन निकायों के रूप में उपयोग किया जाए। तथापि, इनके गठन में दो कारक थे जिसने इन्हें कठिन बना दिया। पहला, प्रांतीय विधान सभाओं का संख्यात्मक बल प्रत्येक प्रांत में कुल जनसंख्या को उसी अनुपात को नहीं दिखाता। दूसरा, सांप्रदायिक पंचाट द्वारा अल्पसंख्यकों को अधिमान दिए जाने के कारण प्रत्येक प्रांतीय विधान सभा में अनेक समुदायों की संख्या प्रांत में उनकी संख्या के अनुपात में नहीं है। इन प्रश्नों को हल करने के अभिप्रायः से विभिन्न विधियों पर अत्यधिक सावधानीपूर्वक विचार