82. परिशिष्ट-VII भारत में पददलितों को अत्याचारियों के हवाले किया गया। - Page 380

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श्री विलियम कोव ( लेबर ) बीच में बोलेः क्या श्री चर्चिल मताधिकार को बढ़ाने के पक्ष में हैं?

श्री चर्चिलः “ हां, निश्चित रुप से ” श्री कोव हंसे मैं हमेशा मताधिकार बढ़ाने के पक्ष में रह हूं। मैं लोगों की इच्छा में विश्वास रखता हूं। लेकिन मैं लोगों की इच्छा को विकृत करने में विश्वास नहीं करता सक्रिय रुप से संगठित एवं सफल अल्पसंख्यक जिन्होंने बल या धोखे या कुतर्क से सŸा छीनी है वे आगे बढ़ेंगे और विशाल जनता के नाम में उस शक्ति का उपयोग करेंगे जिनके साथ उनका वास्तविक संबंध बहुत पहले खत्म हो चुका है।

“ लेकिन केबिनेट मिशन का संविधान सभा के गठन का मई का प्रस्ताव अनिवार्यतः ऐसा प्रस्ताव था जिसका आशय था कि भारत के प्रमुख राजनीतिक दलों को मिलकर और अपने प्रतिनिधियों के जरिए प्रस्तावित संविधान के निर्माण की कोशिश करनी चाहिए ” ।

श्री चर्चिल ने आगे बोलते हुए कहा “ यह पता लगाना अभी भी प्रासंगिक है, यदि महामहिम की सरकार सोचती है कि क्या संविधान सभा का उनके द्वारा प्रस्तावित सम्मेलन शुरु हो गया है ” ।

उन्होंने आगे कहा, “ मैं सकारात्मक समापन के लिए आध्य महसूस करता हूं हालांकि मैं इसकी अभिव्यक्ति नकारात्मक रुन में करुंगा ” । (सŸारुढ़ दल की हंसी)

“ इस सब गड़गड़, बनिश्चितता और उठती आंधी के बीच जिन्होंने भारतीय समस्या का अध्ययन वर्षों से किया है उन्होंने अवष्य यह अनुमान लगा लिया होगा कि वर्तमान में इसके केवल तीन विकल्प तीन लोक प्रसिद्ध विकल्प- ब्रिटिश संसद के समक्ष हैं।

“ पहला यह है कि निर्दयता के साथ भारत छोड़ दो बिना यह सोचे-समझे कि वहां बाद में क्या हो सकता है। दूसरा यह है कि समझौते के न होने पर, जो अभी होता दिखाई नहीं दे रहा हैं, संसद द्वारा नियुक्त एक निष्पक्ष प्रशासन स्थापित करना चाहिए ताकि उन करोड़ो-लाखों साधारण लोगों के लिए जीवन जा सकें जो संकट घबराहट और भय के साये में खड़े हैं। तीसरा यह है कि भारतीय समुदायों को उनकी मर्जी से ब्रिटिश राष्ट्रमंडल के अंदर या बाहर पृथक रास्तों पर जाने दें, फिर चाहे कुछ भी हो ” ।