362 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
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सवर्ण
हिंदू
“ तथापि एक बात यह है चाहे कुछ भी हो हमें यह बिल्कुल नहीं करना चाहिएः हमें भारतीय सेना में ब्रिटिश सेना या ब्रिटिश अधिकारियों को 90,000,000 मुसलमानों और 60,000,000 अछूतों पर सवर्ण हिंदुओं की प्रधानता को बनाए रखने का माध्यम और साधन नही बनने देना चाहिए और न ही ब्रिटिश प्रतिष्ठा या प्राधिकार को, यहां तक कि इसके पतन के समय में भी, इन समुदायों में गंभीर और भयानक मतभेदों के होते हुए भी हमें किसी के साथ भी पक्षपात करने में उपयोग में नहीं लाना चाहिए।
“ इस प्रकार का व्यवहार अपनाकर लाखों-करोड़ो अल्पसंख्यकों के ऊपर धार्मिक और पार्टी की जीत का दबाव डालने से ऐसा लगेगा जैसे हमारी समस्त नीतियों के प्रतिकूल स्थितियां मिलकर एक हो गई हैं और हम अपने बोझ या मुक्ति, चाहे कितने ही दुखद रुप में हमने नैतिक और वास्तविक उŸारदायित्व से हमने उप्हें पाया हो, से राहत पाने के बजाय हम और गहरे दुख में डूबते जा रहे हैं।
“ इसीलिए हम अनुभव करते हैं कि ब्रिटिश लोगों और भारतीय लोगों को जो वर्तमान में कष्टों और परेशानियों से जूझ रहे हैं-इन मद्दों से स्पष्ट और साफ-साफ रुप में अवगत करा देना चाहिए। इसी कारण हम सोचते हैं कि यह हमारा भारी कर्तव्य है कि हम इस वाद-विवाद की मांग करें। (विपक्ष की जोरदार करतल-ध्वनि)
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ने
टोरी
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स्थिति
स्पष्ट
श्री
बटलर
विपक्ष की ओर से समापन करते हुए श्री आर.ए. बटलर, पूर्व विदेश अवर मंत्री, भारत ने कहा कि मुझे जो अवसर भारतीय राजनेताओं से भेंट करने के मिले हैं उससे मुझे पक्का विश्वास है कि जो काम मैंने उनके साथ मिलकर किया है उनसे बेहतर गुणी राजनेता विश्व में नहीं थे। इसलिए हमने जो लक्ष्य अपने समझ निर्धारित किया है उसमें कोई मतभेद नहीं है। हमने (विपक्ष) ने हमेशा पूर्व में कहा है कि भारत के लिए स्व-शासन केवल उस संविधान या संविधानों के अंतर्गत प्राप्त किया जा सकता है, जो भारतीय द्वारा निर्मित हों जिसमें भारत के राष्ट्रीय जीवन के मुख्य तत्व परस्पर सहमत पक्ष हैं। यह हमारा पहला दायित्व रहा है। हमारा दूसरा दायित्व यह है कि हम भारत पर अपना अंतिम नियंत्रण उस सरकार या सरकारों को अंतरित कर सकते हैं जो इसे चलाने में सक्षम हों। हम भारत को अराजकता या गृहयुद्ध में नहीं छोड़ सकते। भारतीय स्थिति पर सरकार के पिछले वक्तव्य से यह पता चलता है कि उसने इनमें से पहले दायित्व को स्वीकारा है।