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बाद उन्हें भारतीय संघ के मामलों में उसी प्रकार बोलने का कोई अधिकार नहीं है जिस प्रकार किसी अन्य विदेशी शासक को।
कायदे-आज़म की देशी राज्यों में गड़बड़ी उत्पन्न करने की कोशिश, उनकी अखिल भारतीय नेता की छवि बनाने की ललक का यह पहला उदाहरण नहीं है। उनके एक अनुयायी के अनुसार उन्होंने मोपलस्तान के आंदोलन का समर्थन किया है, इसका आधार क्या है यह केवल वही जानते हैं।
श्री जिन्ना संविधानिक मामलों में विशेशज्ञ के रुप में बोलते हैं। उनके लिए यह उचित होगा कि वह अपने इस विशेश ज्ञान को उन सांविधानिक गुत्थियों को सुलझाने में इस्तेमाल करें जो पाकिस्तानी सांविधान सभा में उठेंगी।
श्री जिन्ना को यह निश्चय करना होगा कि वे पाकिस्तान राज्य के भावी राज्याध्यक्ष के रुप में कार्य करें या वे संघ में कार्य करने की जिम्मेवारी उठाएं।
ऐसा नहीं है कि श्री जिन्ना को उन मामलों में हस्तक्षेप करने का विशेषाधिकार दिया गया है जिनसे उनका कोई सरोकार नहीं है। संघ में न बने रहने की उनकी पार्टी की इच्छा उन्हें पृथक राज्य मिल गया है। अब वे शेष भारत में समस्याएं उत्पन्न नहीं कर सकते।
कांग्रेस को शीघ्र कार्रवाई करनी होगी। भाषण बाद में दिए जा सकते हैं। युक्तिपूर्ण रुप में, वर्तमान स्थिति बहुत खराब है। यह दुखद होगा यदि कांग्रेस उस समय जागे जब उसे यह ज्ञात हो कि अति आशावाद ने उसकी परेशानियों में इजाफा किया है।
- द् फ्री प्रेस जरनल दिनांक 5 जून, 1945