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पर डोमिनियम स्थिति प्रदान करने से संबंधित खंड जोड़ने पर भारत के लोगों को उसे अपनी संप्रभुŸा के विरुद्ध और इसलिए बातिल और शून्य मानना चाहिए और यह घोषित करना चाहिए कि भारत सरकार कभी भी किसी भारतीय राज्य को प्रभुता संपन्न स्वतंत्र राज्य के रुप में मान्यता प्रदान नहीं करेगी ” ।
इस वक्तव्य के दौरान डॉ. अम्बेडकर ने टिप्पणी कीः ट्रावण होकर और हैदराबाद द्वारा यह उद्घघोषणा किए जाने पर कि वे 15 अगस्त, 1947 को जब भारत डोमिनियन हो जाएगा, वे अपने आपको स्वतंत्र प्रभुता संपन्न राज्य घोषित करेंगे और अन्य राज्यों द्वारा उनका अनुसरण करने की अभिरुचि से एक नई समस्या उत्पन्न हो गई है, जो हिंदू-मुस्लिम समस्या से अधिक बदतर हो सकती है चूंकि इससे अवष्य ही भारत का और अधिक विभाजन होगा।
दावे का अधिकार
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राज्यों द्वारा अपने आपको स्वतंत्र घोषित करने के अधिकार के दावे का आधार केबिनेट मिशन द्वारा जारी 12 मई, 1946 के कथन में विद्यमान है जिसमें कहा गया है कि ब्रिटिश सरकार किसी भी हालत में परमोच्च शक्ति भारतीय सरकार को अंतरित नहीं कर सके है और न करेगी, जिसका आशय है कि क्राउन के साथ संबंधों के कारण राज्यों के जो अधिकार है वे अब नहीं रहेंगे और राज्यों द्वारा परमोच शक्ति को सौंपे गए सभी अधिकार राज्यों को वापिस मिल जाएंगे।
केबिनेट मिशन का कथन कि क्राउन परमोच्च शक्ति अंतरित नहीं कर सका स्पष्टतया राजनीतिक नीति का वक्तव्य नहीं है। यह कानून से संबंधित है और प्रश्न यह हैः क्या यह कानून का सही वक्तव्य है चूंकि यह राज्यों पर लागू होता है?
“ केबिनेट मिशन द्वारा निर्दिष्ट प्रस्ताव में कुछ मौलिक नहीं है। क्राउन और भारतीय राज्यों के बीच संबंधों की जांच के लिए 1929 में नियुक्त बटलर समिति द्वारा प्रतिपादित दृष्टिकोण की मात्र पुनरावृŸा है ” ।
यह सिद्धांत कि परमोच्च षक्ति किसी भी भारतीय राज्य के अंतरित की जा सकती है अत्यधिक हानिकर सिद्धांत है और अंतर्निहित मुद्दों की निपट नासमझी पर आधारित है।