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भारत में अंग्रेजों द्वारा किये गए सुधार का अनुकरण करें एवं धर्म तथा पुजारियों को उचित नियंत्रण मं लाएँ तथा उसकी पदवी एवं अनियंत्रित वृद्धि को रोकें।
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जन साधारण के मध्य प्रचलित अंधविश्वासी प्रथाओं के विरुद्ध प्रभावी कानून बनाया जाना अत्यंत आवश्यक है। अंधविश्वासों का समर्थन पुजारी करते हैं। देवी-देवताओं को अपव्ययी भेंट, मृत्यु पर लम्बी अवधि तक शोक एवं अनेक अनुष्ठान, जन्म एवं विवाहों पर बहुवधि समारोह, असंवेदनशील जातिगत भाव जैसी कुछ अव्यावहारिक एवं निरर्थक प्रथाएँ हैं जिनमें पुजारी आनन्दित होते हैं। जैसे विवाह का आनंदपूर्ण अवसर हो अथवा मृत्यु का अवपूर्ण अवसर पुजारियों द्वारा दोनों में समान रूप से लाभ उठाया जाता है, एक पारसी संवाददाता ने उत्कृष्ट रूप से बताया है कि कुछ पुजारी प्रार्थना करते हैं। ताकि वे अपने शिकार को फंसाने में सफल हों। मेरा मानना है कि पुरोहिताई की बुराइयों की विषय सूची वास्तव में भयावह है। इसके पूर्णतया उन्मूलन को एक ध्येय के रूप में दृष्टिगत रखा जा सकता है लेकिन हम अपने इस सार्वजनिक हित के अभियान को इतनी जल्दी प्रारंभ नहीं कर सकते। मैं कुछ प्रतिष्ठित पारसियों द्वारा संगठित रूप से उठाये गये कदमों का हार्दिक रूप से स्वागत करता हूँ। यह वास्तव में आश्चर्यजनक है कि पारसी समुदाय पुजारियों के जाल में कितना जकड़ा हुआ है।
कुछ पारसी मित्रों द्वारा किये गये आकलन से पाया गया है कि एक निर्धन पारसी परिवार में किसी के जीवित रहने की अपेक्षा उसकी मृत्यु के पश्चात् एक वर्ष तक मृतक के परिवार पर आर्थिक बोझ अधिक होता है। एक पारसी समाचार पत्र में हाल ही में एक व्यक्ति का दृष्टांत दिया गया था जो जीवित रहते हुए बड़ी कठिनाई से एल्युमीनियम का एक गिलास खरीद सका था, लेकिन जब उसकी मृत्यु हुई तो पुरोहित ने दबाव डाला कि उसके अंतिम संस्कार में एक चाँदी का गिलास होना चाहिए। मैंने इसका उदाहरण यह दर्शाने के लिए दिया है कि पारसियों ने अपनी व्यावहारिक बुद्धिमता से भारत को पुरोहितों की छल रूपी बुराई से मुक्ति दिलाने में अग्रणी भूमिका निभाई है एवं मुझे कोई संदेह नहीं है कि सभी प्रबुद्ध हिन्दू, मुसलमान एवं इसाई पुरोहितवाद के उन्मूलन के इस महान एवं उत्कृष्ट कार्य में शामिल होंगे और इसमें उन्हें अपने पारसी भाइयों की तुलना में कम मशक्कत करनी पड़ेगी। ख्1,
1 ः‘द बम्बई क्रानिकल, दिनांक नवम्बर-08, 1929’’