90. बंबई प्रेजीडेन्सी में कानूनी शिक्षा के सुधार पर विचार - Page 410

391

तथा उसे किसी मान्यता प्राप्त संस्थान से कानूनी प्रशिक्षण लेना अनिवार्य नहीं है तथा वह किसी अन्तराल के बार-काउंसिल की परीक्षा में बैठने हेतु पात्र है। वकील (मूल क्षेत्र) वकील (अपील क्षेत्र) की तरह कानून में स्नातक (एल.एल.बी.) होता है एवं वह कुल 5 वर्ष का कानूनी प्रशिक्षण प्राप्त होता है। कानून में स्नातक की डिग्री लेने के उपरान्त 2 वर्ष के अन्तराल में प्रत्याशी वकील मूल क्षेत्र की परीक्षा में बैठता है। वह तब तक व्यवसाय करने का पात्र बनता, जब तक कि वह किसी वरिष्ठ प्रेक्टिशनर (अधिवक्ता) के चैम्बर में एक वर्ष का अध्ययन पूर्ण नहीं कर लेता एवं इस प्रकार उसे मैट्रिक करने के उपरान्त कुल 9 वर्ष बिताने पड़ते हैं। न्यायाभिकर्ता (सालिसीटर) फर्म के साथ करारनामे पर हस्ताक्षर करने से करारनामा हस्ताक्षर करने के तीन वर्ष पश्चात् परीक्षा होती है। इस प्रकार यदि कोई स्नातक के पश्चात् फर्म में नियुक्त होता है तो सात वर्ष का प्रशिक्षण और यदि कोई एल.एल.बी. के पश्चात् नियुक्त होता है तो उसे 9 वर्ष का प्रशिक्षण लेना होता है। इन सबमें मुख्तियार सबसे निचले क्रम पर है। इसके लिए उसे न तो कानून में कोई प्रशिक्षण लेने की आवश्यकता है और न ही कोई योग्यता परीक्षा पास करना आवश्यक है। यह स्थिति दो अन्य परिस्थितियाँ विद्यमान होने के कारण और जटिल हो जाती हैं। पहली तो विभिन्न प्राधिकरण जिन के पास कानूनी परीक्षा में बैठने वाले प्रत्याशियों की परीक्षा लेने का अधिकार है। जहाँ तक अपीलीय क्षेत्र के वकीलों की दो श्रेणियों का संबंध है, वहाँ दो विभिन्न प्राधिकरण हैं जिनके पास परीक्षा लेने का अधिकार है। एक श्रेणी की परीक्षा बम्बई विश्वविद्यालय एवं दूसरी श्रेणी की बार काउंसिल द्वारा ली जाती है। वकील (मूल क्षेत्र) एवं सालिसीटर (न्यायाभिकर्ता) के संबंध में परीक्षा लेने वाला निकाय उच्च न्यायालय है। यह अवश्य नोट किया जाये कि परीक्षा लेने वाले ये निकाय, जिनकी वे परीक्षा लेते हैं, उनके अध्यापन का कोई उत्तरदायित्व नहीं लेते। दूसरी परिस्थिति, जो स्थिति की जटिलता को बढ़ाती है। प्रेजीडेन्सी में कानूनी व्यवसायों के मध्य हैसियत की भिन्नता है। वकील (मूल क्षेत्र) एवं बैरिस्टरों के लिये व्यवसाय हेतु सभी विकल्प खुले हैं। वे किसी भी न्यायालय में प्रैक्टिस कर सकते हैं एवं उच्च न्यायालय के भी किसी क्षेत्र में यद्यपि वे केवल न्यायालय में बहस हेतु उपस्थित हो सकते हैं लेकिन न्यायालीन दस्तावेजों को हस्ताक्षरित नहीं कर सकते। वकील (अपीलीय क्षेत्र) उच्च न्यायालय के संबंध में अपीलीय क्षेत्र तक सीमित हैं’’। दूसरी ओर, सालिसीटर (न्यायाभिकर्ता) कहीं भी (प्रैक्टिस) कर सकता है, जहाँ तक उच्च न्यायालय का संबंध है, स्थानीय क्षेत्र में वह केवल दस्तावेज संबंधी कार्य कर सकता है, जबकि अपीलीय न्यायालय में वह जिरह के साथ-साथ दस्तावेज संबंधी कार्य भी कर सकता है।