394 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
- विधि-महाविद्यालय का गठन किस प्रकार किया जाना चाहिये ताकि निर्धारित पाठ्यक्रम पर अधिकतम दक्ष पद्धति से कार्यवाही की जा सके।
मुझे प्रश्न सं. 3 निर्णायक एवं उपयुक्त प्रतीत होता है। शेष तीन प्रश्नों का समाधान इसके सही उत्तर पर निर्भर करता है। बम्बई विश्वविद्यालय द्वारा एल.एल.बी. परीक्षा के लिए नियुक्त परीक्षकों द्वारा समय-समय पर दी गई रिपोर्ट, जिसमें प्रत्याशियों के कार्यों के प्रति उनके विचार भी सम्मिलित किये गये हैं, में इस विषय पर सटीक हल दिया गया है। इन रिपोर्टों के परिशीलन से यह भी ज्ञात होता है कि परीक्षकों ने परीक्षार्थियों के कार्य में निम्नलिखित त्रुटियों पर भी बल दिया है :
- कानून, जिनका उन्हें अध्ययन करना है, के अन्तर्निहित मूलभूत
सिद्धान्तों को सही रूप से समझने के किसी संकेत का अभाव।
सामान्य ज्ञान में किसी मूल सिद्धान्तों की पूर्व शिक्षा का अभाव।
विषय के सुव्यवस्थित प्रस्तुतीकरण की आवश्यकता।
पूछे गये प्रश्न के दिये गये उत्तर की प्रासंगिता में अर्थ का
अभाव।
तथ्यों, तर्कों व विचारों के वर्णन में विशुद्ध ज्ञान का अभाव।
अपने विचारों को स्पष्ट भाषा में व्यक्त करने में विद्यार्थियों की
असमर्थता।
निस्संदेह कानून के विद्यार्थियों में अत्यन्त गंभीर त्रुटियाँ हैं एवं इन्हें दूर करने के लिए कुछ आवश्यक कदम उठाये जाने चाहिए। इन त्रुटियों को कैसे दूर किया जा सकता है? हमें सबसे पहले यह समझना चाहिए की ये त्रुटियाँ किस कारण से हैं? मेरे विचार से ये त्रुटियाँ दो कारणों से हैं यथा त्रुटिपूर्ण पाठ्यक्रम एवं शिक्षा प्रदान करने की दोषयुक्त प्रणाली।
शिक्षाविदों के विचार से कानून के अध्ययन में कुछ अन्य विशेष सहायक विषयों का अध्ययन अपेक्षित है, जिसके बिना केवल कानून का अध्ययन व्यवसाय की प्रैक्टिस के लिए अधूरा अध्ययन होना। ये सहायक विषय क्या होने चाहिये, इनका आकलन करना कठिन नहीं होगा यदि हम याद रखें कि एक वकील के पास एक कानूनी मस्तिष्क होना चाहिए जो अपने ज्ञान का प्रदर्शन सार्वजनिक स्थल पर साक्ष्यों के माध्यम से स्पष्ट रूप से कर सके।
अपने वक्तव्य में किये गये व्यंग्य की एक क्षण के लिए उपेक्षा कर दी जाए तो मेरे