90. बंबई प्रेजीडेन्सी में कानूनी शिक्षा के सुधार पर विचार - Page 418

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कर दिया जायेगा। केवल निश्चित उद्देश्य रखने वाले ही इसमें प्रवेश लेंगे।

इस प्रकार इससे व्यवसाय में अत्यधिक भीड़भाड़ होने पर रोक लगेगी। मैंने

इस संबंध में जिनसे चर्चा की है उन्होंने एक आपत्ति करते हुए अपना तर्क

दिया है। वह यह है कि एक मैट्रिक पास विद्यार्थी कानून के व्याख्यान को

समझने के लिए समर्थ नहीं हो सकता। इसके लिये मैं दोतरफा उत्तर देता

हूँ। मेरे मित्र श्री एस.जी. जोशी, एम.ए., एल.एल.बी., बम्बई उच्च न्यायालय

के वकील ने मुझे आश्वस्त किया है कि इस आपत्ति में कोई सार नहीं है।

जैसाकि परिणाम दर्शाते हैं वे गत कई वर्षों से बार काउंसिल की परीक्षा हेतु

कक्षाओं का बखूबी संचालन कर रहे हैं। उन्हें मैट्रिक विद्यार्थियों को कानून

की शिक्षा प्रदान करने का अनुभव है एवं इस संबंध में उनके विचारों को

काफी महत्त्व देता हूँ। मेरा दूसरा उत्तर यह है कि मेरी योजना के अनुसार

एल.एल.बी. पाठ्यक्रम की अवधि दो वर्ष है एवं कानून के अध्ययन को प्रथम

वर्ष से आरंभ किये जाने की आवश्यकता नहीं है। इसे दूसरे वर्ष से आरंभ

किया जाये।

विधि-महाविद्यालयों के पुनर्गठन के अन्तिम प्रश्न पर आता हूँ इस प्रश्न पर सन् 1898 में नियुक्त एक समिति एवं वर्ष 1915 में नियुक्त एक अन्य समिति, जिसे चंदावरकर कमेटी के नाम से जाना जाता है, द्वारा विचार किया गया था एवं प्रस्ताव रद्द कर दिया गया था। मैं मानता हूँ कि विधि-महाविद्यालय को पूर्ण दिवसीय बनाने के प्रस्ताव के विरुद्ध मेरा विचार भेदभावपूर्ण है। यह सच्चाई है कि वर्तमान में काफी छात्र, जो कानून का अध्ययन कर रहे हैं, दिन के समय अपनी आजीविका अर्जन हेतु कार्य कर रहे हैं। वास्वत में अधिकतर छात्रों के लिये कानूनी-शिक्षा संभव नहीं हो सकेगी यदि वे अध्ययन के दौरान अपनी जीविका अर्जित करने की स्थिति में नहीं होंगे। यदि अध्ययन की कुल अवधि को बढ़ाकर 6 वर्ष कर दिया जाता जैसाकि वर्तमान में हो रहा है तब भी मैं महाविद्यालय को पूर्ण दिवसीय बनाने के प्रस्ताव का विरोध करूँगा। मेरे विचार से कोई भी शिक्षाविद् शिक्षा की ऐसी पद्धति की योजना बनाने में न्यायोचित नहीं होगा जो अभिभावकों पर एक विद्यार्थी की पढ़ाई का भार छः वर्षों के लिए लाद दिया जाये। लेकिन वास्तविकता को दृष्टिगत रखते हुए मेरे विचार से पाठ्यक्रम समापन के लिए केवल चार वर्ष ही अपेक्षित हैं, इस तथ्य को भी दृष्टिगत रखा जाए कि छात्र किस हद तक अपरिवक्ता के स्तर पर ही अध्ययन प्रारंभ करता है मैं अपने दृष्टिकोण परिवर्तन करते हुए यह अनुभव करता हूँ कि पूर्णकालिक महाविद्यालय की नितात आवश्यकता है।

महाविद्यालय के कर्मचारियों के संबंध में इसे दो भागों में विभाजित करूँगा-