90. बंबई प्रेजीडेन्सी में कानूनी शिक्षा के सुधार पर विचार - Page 419

400 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

शिक्षक एवं प्राध्यापक। मैं चाहता हूँ कि कानून की वास्तविक पढ़ाई व्यवसाय की प्रैक्टिस करने वाले सदस्यों में से चुने हुए व्यक्तियों द्वारा कराई जानी चाहिए। व्यवसाय प्रैक्टिस करने वाले सदस्यों से पारस्परिक विचार-विमर्श पर ही चलता है। उसे व्यावहारिकता के पक्ष में प्रोत्साहित किया जाये। केवल प्रैक्टिस करने वाले सदस्यों के सम्पर्क से ही उसके प्रशिक्षण में व्यावहारिक रूप से प्रोत्साहन मिलेगा। अतः प्राध्यापक स्टाफ के स्थायी सदस्य होना अपेक्षित नहीं है। केवल प्रधानाध्यापक एवं शिक्षक स्टाफ के सदस्य होने चाहिए। शिक्षकों का कार्य छात्रों को पढ़ाना तथा परीक्षा के लिए तैयार करना होना चाहिए एवं प्रधानाचार्य केवल व्याख्यान देने का कार्य करेंगे।

स्टाफ को दो श्रेणियों में विभाजित करने का उद्देश्य मुख्य रूप से शिक्षण प्रणाली में त्रुटियों को दूर करना है। शिक्षण प्रणाली में वर्तमान प्रचलित दोष विधि महाविद्यालय में पढ़ाने का अनुभव रखने वाले किसी भी व्यक्ति को सुगमता से स्पष्ट हो जाएगा। वर्तमान प्रणाली के अन्तर्गत छात्र द्वारा शिक्षा का जो अंश ग्रहण किया जाता है वह प्राध्यापकों द्वारा दिये गये व्याख्यानों के नोट लिखना ही होता है।

यह प्रणाली अधिकतम विद्यार्थियों को विभिन्न अधिनियमों के प्रावधानों से परिचित कराती है। लेकिन यह संदेहास्पद है कि क्या मात्र व्याख्यान देने की प्रणाली से विद्यार्थियों के मस्तिष्क में इतना प्रशिक्षण पर्याप्त रूप में प्राप्त हो जाता है जो प्रैक्टिस के दौरान उत्पन्न तथ्यों की जटिलता में कानूनी सिद्धांतों को लागू करने में समर्थ हो सके। प्रणाली में ऐसा कुछ नहीं है जो विद्यार्थियों को निर्धारित पाठ्यपुस्तकों के पठन द्वारा व्याख्यानों के अनुसरण हेतु विवश करें, ऐसा न होने के परिणामस्वरूप विद्यार्थी परीक्षा की तिथि से कुछ दिनों पूर्व तक कुछ भी पढ़ाई नहीं करता एवं तब वह पढ़ाई के अधिकतम हिस्से को पूरा करने हेतु नोट्स एवं पुस्तकों को कंठस्थ करने का सहारा लेता है।

कानून में शिक्षण देने की उपयुक्त प्रणाली के बारे में विभिन्न विचार हैं। कुछ केस प्रणाली को तथा अन्य व्याख्यानों द्वारा अनुपूरक पाठ्यपुस्तक प्रणाली को प्रमुखता देते हैं। कोई भी दावे से नहीं कह सकता कि दोनों में से कौन-सी प्रणाली सही है? शिक्षण की पद्धति को सामान्यतया शिक्षकों के व्यक्तिगत विवेक पर छोड़ दिया जाना चाहिए। लेकिन मेरा विश्वास है शिक्षकों की जानकारी के लिए कुछ सकारात्मक निर्देश दिये जाने आवश्यक हैं कि वर्तमान प्रणाली त्रुटिपूर्ण है एवं प्रयास अधिक करने होंगे और वे शिक्षित होते हुए प्रशिक्षित भी होंगे। मेरी यह राय है केवल व्याख्यानों की बजाय व्याख्यान एवं शिक्षण को सम्मिलित अनुपूरक के रूप में नहीं माना जाए। नये एवं बेहतर श्रेणी के वकील तैयार करने की महाविद्यालयों से अधिक आशा नहीं की जा सकती।