401
मेरे विचार से कानूनी शिक्षा की पद्धति में सुधार अन्य दिशाओं में सुधार के साथ किया जाना चाहिए :-
- कानून में विभिन्न परीक्षाओं को समाप्त कर दिया जाना चाहिए तथा इसके
स्थान पर सभी पेशेवरों के लिए एक संयुक्त परीक्षा आयोजित की जानी
चाहिए तथा विधिवेता (अपीलीय क्षेत्र) एवं विधिवेता (मूल क्षेत्र) के मध्य कोई
अन्तर पाया जाता है तो उसे समाप्त कर दिया जाना चाहिए। यदि भिन्नता
बनाये रखी जाती है तो यह व्यवसायी के विकल्प पर होनी चाहिए और
उसके सनद् के लिये आवेदन करने पर उसे इस निर्णय हेतु बुलाया जा
सके कि वह विधिवेता (अपीलीय क्षेत्र) या विधिवेता (मूल क्षेत्र) अथवा एक
न्यायाभिकर्त्ता के रूप में प्रैक्टिस (व्यवसाय) करेगा।
- यहाँ एक सांझी परीक्षण संस्था होनी चाहिए। पुनर्गठन की इस योजना
के एक भाग के रूप में मैं सोचता हूँ कि कानूनी शिक्षा के पर्यवेक्षण के
साथ-साथ कानून में परीक्षा आयोजित करने के लिए भी एक कानूनी शिक्षा
परिषद् स्थापित की जानी चाहिए। इस संस्था में निम्नलिखित सम्मिलित
होने चाहिए :-
क) विश्वविद्यालय के प्रतिनिधि।
ख) उच्च न्यायालय के न्यायाधीशों के प्रतिनिधि।
ग) बार के प्रतिनिधि।
घ) विधि-महाविद्यालयों के प्राध्यापकों के प्रतिनिधि।
ड.) जनता के प्रतिनिधि।
मैं बार कांउसिल को परीक्षा का कार्य सौंपने के लिए तैयार नहीं हूँ। काउंसिल से ट्रेड यूनियन की मानसिकता विकसित होने का खतरा है। कानूनी शिक्षा की सम्पूर्ण प्रणाली के लिये यह घातक होगा यदि परीक्षा आयोजन में यह मानसिकता एक कार्यशील ताकत का रूप ले लेती है। परीक्षा की इस पद्धति ने पहले ही कानून के अध्ययन में सभी हितों को समाप्त कर दिया है। इस बात का ध्यान रखा जाना चाहिए कि इस दुर्भाग्यपूर्ण परिणाम हेतु कोई उत्तेजना न हो।
- सनद प्रदान करना केवल परीक्षा पास करने पर आधारित नहीं होना चाहिए।
इसे तीन शर्तों के पूरा होने के अधीन होना चाहिए :-