91. डॉ. अम्बेडकर का सर एस. राधाकृष्णन को उत्तर अतिजीवन्त सिद्धान्त - Page 423

404 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

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डॉ. अम्बेडकर का सर एस. राधाकृष्णन को उत्तर

‘‘प्रो. राधाकृष्णन ने एक बार कहा था कि हिन्दुओं की महानता को सिद्ध करने के लिये एक तर्क है और यह इस प्रकार हैः हिन्दू समय के हिचकोलों के बावजूद जीवित है। यह अभी भी विद्यमान है जबकि अन्य प्राचीन धर्म एवं सम्प्रदाय बहुत पहले समाप्त हो चुके हैं।

इस तर्क के उत्तर में डॉ. अम्बेडकर का कहना हैः-

मुझे भय है कि यह कथन उग्र तर्क का आधार बन सकता है कि जीवित रहने का अंश जीवित रहने के लिए स्वस्थता का प्रमाण है। मुझे ऐसा प्रतीत होता है कि प्रश्न यह नहीं है कि एक समुदाय जीवित रहता है या समाप्त हो जाता है, बल्कि प्रश्न यह है कि किस अवस्था में जीवित है। जीवित रहने हेतु विभिन्न पद्धतियाँ हैं, लेकिन सभी समान रूप से सम्मानीय नहीं हैं। एक व्यक्ति के साथ-साथ एक समाज का केवल जीना एवं यथेष्ठ रूप से जीने के मध्य एक गहरी खाई है। एक युद्ध में केवल लड़ना एवं यश के साथ जीना एक पद्धति है। एकान्तवास अपनाना, आत्मसमर्पण करना, बन्धक जीव के रूप में जीवित रहना भी एक प्रकार की शैली है। हिन्दुओं के लिये यह निरर्थक है कि इस तथ्य से सन्तुष्ट हो कि वे एवं उनके लोग जीवित हैं। उन्हें इस पर अवश्य विचार करना चाहिये कि उनके जीवित रहने की गुणवत्ता अर्थात् रहन-सहन की शैली क्या है। यदि वह ऐसा करता है तो मैं आश्वस्त हूँ कि वह जीवित रहने के तथ्य पर गर्व करना बंद कर देगा। हिन्दू हमेशा से पराजय का जीवन जीते रहे हैं एवं उन्हें शाश्वत प्रतीत होने वाला जीवन हमेशा शाश्वत नहीं बना रहेगा। यह जीवित बने रहने की शैली है विशुद्ध सोच वाले हिन्दू जो सच्चाई को स्वीकार करने से नहीं डरते वे इस जीवन शैली को अपनाकर अपने आपको शर्मसार अनुभव करेंगे। ख्1,

  1. ‘‘लैम्प’’ में दिनांक 25 जून, 1936 को प्रकाशित, खैरमौड खण्ड-6 पृष्ठ-266