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और लार्ड ने - तक कहा
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प्रिवी काउंसिल 1829-31 के लार्डों के समक्ष बहस एवं निश्चित किये गए मामलों की रिपोर्टें जेरोम विम.नेप. बैरिस्टर-एट-लॉ के द्वारा खण्ड-1 (डॉ. बी. आर. अम्बेडकर द्वारा लिखित एक नोट)

सर्वोच्च न्यायालय का मामला जिसका निर्णय 14 मई, 1829 को किया गया था को नीचे पुनः मुद्रित किया गाय है। यह सोचना गलत होगा कि मामला केवल पुरातत्ववेत्ता विषयक रुचि का है क्योंकि यह 107 वर्ष पुराना है। यह मामला केवल इतिहास के विद्यार्थियों की रुचि का ही नहीं है, बल्कि यह कानून के छात्रों के साथ-साथ जन-साधारण की रुचि का भी है। इतिहास के छात्र ईस्ट इण्डिया कम्पनी एवं क्राउन राज के अधिकारियों के मध्य दोहरी शासन पद्धति के दौरान ईर्ष्या एवं द्वेष के बारे में जानते हैं, जिसके परिणामस्वरूप विद्रोह हुआ। सर एडवर्ड वैस्ट के जीवन वृत्त एवं संस्मरण को पाठक याद करेंगे कि ईस्ट इण्डिया कम्पनी द्वारा नियुक्त एक गवर्नर ने राजा द्वारा नियुक्त सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश के साथ झगड़ा करने का कैसे षड्यंत्र रचा था। इतिहास के विद्यार्थियों के लिए मामला रुचिकर है क्योंकि यह विस्तारपूर्वक स्पष्ट करता है कि उन पुराने दिनों में कम्पनी के अधिकारियों तथा एक राजा के अधिकारियों के मध्य कितनी अधिक ईर्ष्या एवं नफरत हो गई थी। यह मामला पुराना होते हुये भी कानून के विद्यार्थियों के लिए एक बड़ा एवं महत्त्वपूर्ण मामला है। इस मामले में उठाया गया मुद्दा कि क्या बम्बई में स्थापित सर्वोच्च न्यायालय को ऐसे व्यक्ति के विरुद्ध बन्दी प्रत्यक्षीकरण का आदेश जारी करने का अधिकार है जो अपने स्थानीय क्षेत्र में नही रह रहा है। इस निर्णय का सर्वोच्च न्यायालय की शक्तियों से संबंध है, सर्वोच्च न्यायालय की विद्यमानता समाप्त कर दी गई है फिर भी वर्तमान कानून के छात्रों के लिए मामले का महत्त्व निस्संदेह समाप्त नहीं हुआ है। मूल स्थानीय क्षेत्र के अतिरिक्त क्षेत्र के व्यक्ति के लिए बन्दी प्रत्यक्षीकरण संबंधी याचिका जारी करने की शक्ति को रोक देने के प्रश्न का उत्तर केवल शक्तियों के संदर्भ में दिया जा सकता है जो कभी