408 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
और इसके अतिरिक्त राजा ने सर्वोच्च न्यायालय को अनुबन्धित करने के लिए निदेश जारी किए, विधान बनाये और आधिकारिक क्षेत्र नियत किए। यह न्यायालय क्षेत्रों में सुनवाई और मुकदमों व कार्यप्रणालियों को उक्त अधिकार-लेख में उल्लिखित कई प्रावधानों, छूटों और घोषणाओं की शर्त पर कथित सरकार के कार्यक्षेत्र में सुनवाई एवं मुकदमों के निर्धारण हेतु कार्यशील रहेगा और ऐसे दीवानी दावों और कार्यवाहियों को प्रारम्भ, मुकदमा चलाने और निर्धारित करने तथा उन पर निर्णय देने एवं दिये निर्णयों को क्रियान्वित करने के लिए कार्यप्रणाली तैयार करेगा।
राजा ने कृपापूर्वक स्वीकृति प्रदान करते, निर्देश देते एवं नियुक्ति करते हुए कहा कि उक्त सर्वोच्च न्यायालय समानता का न्यायालय होना चाहिए तथा इस अधिकार के अनुसार इस न्यायालय में बम्बई नगर एवं द्वीप और इसकी सीमाओं तथा इन क्षेत्रों में स्थित फैक्टरियों के सभी व्यक्तियों के लिए एक समान न्यायिक अधिकार होना चाहिए एवं न्यायकरण के लिए नियुक्त न्यायाधीशों को अधिकार प्रदान किए जाने चाहिएँ एवं बन्दीगृह में बन्द करने व रिहा करने का अधिकार भी होना चाहिए।
न्यायालय को बम्बई नगर एवं द्वीप तथा इसकी सीमाओं में धर्मसम्बन्धी अधिकार भी होने चाहिए एवं इसके साथ ही उक्त सर्वोच्च न्यायालय बम्बई शहर, द्वीप एवं उसके अधीन समीओं, फैक्टरियों, उक्त कथित सरकार के निर्णय के अनुसार भविष्य में जुड़ने व कम होने वाले क्षेत्रों के लिए नौसेना अधिकरण का भी न्यायालय होगा।
तथा उक्त सर आर राईस, नाइट ने नवम्बर, 1827 में बम्बई के उक्त सर्वोच्च न्यायालय से वरिष्ठतम कनिष्ठ न्यायाधीश के पद से त्यागपत्र दे दिया, जब उक्त सर सी. एच. चैम्बर्स उक्त स्थान पर वरिष्ठतम कनिष्ठ न्यायाधीश बन गए एवं उक्त सर आर राईस द्वारा त्यागप्रत्र दिये जाने पर प्रार्थी को दिनांक 30 अगस्त, 1827 के अधिकार-लेख द्वारा उक्त सर्वोच्च न्यायालय में एक कनिष्ठ न्यायाधीश के रूप में नियुक्त किया गया एवं उसने 9 फरवरी, 1828 को बम्बई में अपना कार्यभार संभाला।
तथा उक्त मुख्य न्यायाधीश सर एडवर्ड वैस्ट का 18 अगस्त, 1828 को देहान्त हो गया एवं उस वर्ष 3 अक्टूबर को एक पत्र सम्बोधित किया गया।
‘‘सेवा में, माननीय सी.एच. चैम्बर्स एवं सर्वोच्च न्यायालय के कनिष्ठ न्यायाधीश के रूप में प्रार्थी को सम्बन्धित बम्बई कैसल 3 अक्टूबर, 1828 तथा गवर्नर जॉन मैलकाम, टी ब्रेडफोर्ड, लैफ्टिनैट जनरल, सशस्त्र सेनाओं के कमांडर जे.जे. स्पैरो एवं जॉन रोमर परिषद के द्वितीय एवं तृतीय सदस्य द्वारा हस्ताक्षर किए गए।’’
उक्त पत्र का भाव निम्न प्रकार से था -