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हमें पूरी तरह से विदित है कि हमने इस पत्र को आपको सम्बोधित करने में साधारण प्रक्रिया का उल्लंघन किया है, परन्तु जिन परिस्थितियों में हमें धकेल दिया गया है, हमें विश्वास है, उनको दृष्टिगत रखते हुए, यह उल्लंघन उचित है। आपके निजी एवं सार्वजनिक आचरण के संबंध में हम अपनी जानकारी के अनुसार आशा करते हैं कि हमारे कथन को आप उसी भावना से ग्रहण करेंगे जिस भावना से यह लिखा गया है यद्यपि ब्रिटिश न्यायाधीश के रूप में आपके उच्च एवं प्रतिष्ठित कार्यों के प्रत्येक दायित्व को पूर्ण करने की आप कड़ी बाध्यता है। आप इस असाधारण मौके पर अनेक विषयों एवं न्यायालय जिसमें आप पीठासीन हैं, के नियमों पर विचार, विधान-मण् डल को उसके अपने प्रतिष्ठान के रूप में निरीक्षण करना, जैसा कि इस प्रैजीडेन्सी के प्रशासन के लिए, अनुदेशित के साथ सरकार की सहायता एवं समर्थन के अनुसार आप हमारे प्रतिवेदन से अल्पावधि के लिए किसी कार्य (कितना भी आप उन्हें कानूनी समझें) को न करने के लिए प्रेरित होंगे, जिनको नियमाधीन हम करने के लिए बाध्य हैं और इनको हम दोनों अपने दायित्व निभाने के लिए अनिवार्य समझते हैं, क्योंकि इससे आपके व हमारे अधिकारों का टकराव होगा और ऐसा करने से इस देश के मूल नागरिकों की नज़रों में आदरभाव, जो कि हम दोनों के लिए अनिवार्य है न केवल कम होगा बल्कि हमारे साम्राज्य के प्रस्तावित विभाजन से गंभीर रूप से कमजोर हो जायेगा, जबकि हमारे मूल निवासियों के मन में जो धारणा बनी हुई है वह भारतीय साम्राज्य की शान्ति, उन्नति और स्थायित्व के लिए आवश्यक है। इस निष्कर्ष से अनेक परिस्थितियाँ उत्पन्न होंगी, जिनका स्पष्टीकरण यहाँ करना उचित नहीं है, परन्तु हम ने दृढ़तापूर्वक जो कहा है उसके संबंध में सत्य के प्रति अपनी आस्था को व्यक्त करना इस आशा के साथ आवश्यक समझा है कि इसमें सरकार में आपके अधिकार के संबंध में आप पर कुछ दबाव पड़ेगा। आपके पास यह अधिकार हमारे सभी क्षेत्रों और विशेषकर इन क्षेत्रों जिनको हाल ही में हासिल किया है। यह अधिकार केवल सामान्य शान्ति को बनाये रखने के लिए प्राप्त किए हुए हैं परन्तु इन अधिकारों के बने रहने का अर्थ अच्छे शासन और कानूनों के व्यवस्थित रूप से प्रबन्धन पर निर्भर करेगा।
‘‘2 मोरो रघुनाथ (1 नेप 8) और बापू गुनास (1 नेप 11) के मामले में सर्वोच्च न्यायालय की हाल की कार्यवाहियों के परिणामस्वरूप हम अपने-अपने उच्च अधिकारियों को पूरी तरह से बता देने के लिए बाध्य हैं, कि मोरो रघुनाथ के मामले में कोई अन्य कानूनी कार्यवाही स्वीकार नहीं की जाएगी और बन्दी प्रत्यक्षीकरण के संबंध में हाल ही में जारी आदेश या प्रान्तीय न्यायालयों के अधिकारियों को दिये