410 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
गये निर्देश कि हमारे उन मूल नागरिकों, जो बम्बई द्वीप में नहीं रहते हैं, को दिये गये आदेशों के प्रत्युत्तर के लिए कुछ नहीं करेंगे।
‘‘3 हम इन नियमों द्वारा प्रदत्त जिम्मेदारियों के प्रति पूरी तरह सचेत हैं, परन्तु हमें स्थिति की माँग के अनुरूप अपने औचित्य को देखना चाहिए। हमें कार्य सिविल गवर्नमेंट और राज्य की नीति को दृष्टिगत रखते हुए करने चाहिए, परन्तु हमारे प्रस्ताव तब तक परिवर्तित नहीं हो सकते जब तक हमें उन उच्च प्राधिकारियों से आदेश प्राप्त नहीं हो जाते जिनके अधीन हम कार्यरत हैं। हम पूरी उत्सुकता से आशा करते हैं कि हमने जो उक्त तर्क व्यक्त किए हैं आपको निर्दिष्ट मामलों में हमारे आचरण के विरुद्ध उन प्रतिरोधों एवं याचिकाओं के प्रति रोकेंगे, जिन्हें आप अपने दायित्वपूर्ण उल्लिखित कारणों से समझेंगे कि सरकार द्वारा पारित प्रस्ताव एवं स्वीकृति से इस विस्तृत सीमा में वर्तमान तथा भावी संस्थापनाओं से कोई अनुकूल परिणाम नहीं निकलेगा और जनहित के लिए गंभीर रूप से हानिकारक होगा। इस विषय पर हमारे सभी प्रश्नों का उत्तर अल्पावधि में ही प्राप्त हो गया और हमें अपनी आशा पुनः उन दायित्वों के प्रति जिनके लिए हम जागरूक हैं, करनी चाहिए कि दायित्व इतने आवश्यक नहीं हैं जिससे ऐसे कार्यों के लिए प्रवृत्त हो जिसके संबंध में सरकार ने स्पष्ट रूप से प्रस्ताव का विरोध किया है।
‘‘हमें ऐसा होने का गौरव प्राप्त हुआ है आदि आदि।
तब याचिका में कहा गया है कि सोमवार, 6 अक्टूबर को सर्वोच्च न्यायालय की अपने न्यायिक मामलों को निपटाने के लिए बैठक हुई, सर सी.एच. चैम्बर्स ने सम्राट के लिपिक को इस पत्र को पढ़ने के लिए कहा, इसके पश्चात् याचिकादाता सर सी.एच. चैम्बर्स की राय एवं पत्राचार के विषय पर सहमति प्रदान की गई। न्यायालय ने निर्देश दिया कि सम्राट का लिपिक प्रैजीडेन्सी सरकार के मुख्य सचिव को पत्र द्वारा सूचित करें कि उक्त पत्र प्राप्त हो चुका है और न्यायाधीशों ने इसकी उपेक्षा की है।
कि उक्त सर सी.एच. चैम्बर्स का यह आशय था और याचिकादाता को महामहिम के समक्ष साधारण याचिका द्वारा याचिकादाता की उन परिस्थितियों, जिन्हें उपरोक्त रूप से नियत किया गया है पर कर्त्तव्यनिष्ठता एवं समर्पित भाव से सभी प्रकार की प्रैजीडेन्सी सिविल और मिलीटरी शक्तियों से युक्त होने पर भी, मामले के असंवैधानिक एवं आपराधिक प्रयासों पर विचार करते समय सहमति हुई कि मामलों पर सरंक्षण प्राप्त किया जाए ताकि सर्वोच्च न्यायालय से बिना किसी साधारण याचिका या खुले न्यायालय में स्वयं या अपने वकील द्वारा सम्पर्क किया जा सके। केवल यह एक ही रास्ता है जिसमें कानून दूरदर्शी उद्देश्यों के लिए महामहिम न्यायाधीशों को