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सम्बोधित करने की सहमति प्रदान करें और सदियों से दूरदर्शियों द्वारा निषिद्ध ऐसे गुप्त या निजी पत्राचार द्वारा अपने व्यक्तियों को खतरे एवं भ्रष्टता से बचाने के लिए बेवजह विनती या धमकी और न्यायाधीशों को प्रेरित/प्रलोभित करने पर प्रतिबन्ध लगाया जाये ताकि न्यायाधीश ईश्वर, सम्राट और अपने प्रति निष्ठा के दायित्व को पूरा कर सकें तथा जिनको वे कानून समझते हैं, या ऐसी धारणाएँ जिनके द्वारा वे समय-समय पर निर्धारित नीति को प्रतिपादित करते हैं, उनके अनुसार निर्णय देने के लिए मना कर सकें।
कि इस संबंध में याचिका इंग्लैण्ड में भेजने के लिए तैयार की जा रही थी तो उक्त सर्वोच्च न्यायालय के तत्कालीन कार्यकारी मुख्य न्यायाधीश सर चार्ल्स हरकोर्ट चैम्बर्स का 13 अक्टूबर, 1828 को अचानक देहान्त हो गया।
तब याचिका पर विस्तारपूर्वक चर्चा उन उद्देश्यों को स्पष्ट करने के लिए की गई जिन्होंने गवर्नर एवं परिषद् के आचरण को आरोपित करने की कार्यवाहियों के दौरान याचिकादाताओं एवं उनके साथियों को प्रभावित किया और उन को बताया कि बन्दी प्रत्यक्षीकरण का आदेश जिस प्रकार वे चाहते हैं उसके अधिकार सर्वोच्च न्यायालय के पास हैं। अन्ततः उन्होंने अनुरोध किया कि महामहिम इस मामले पर शाही एवं कृपापूर्वक विचार करें जिससे महामहिम की शाही दूरदर्शिता की झलक मिले तथा जिससे बम्बई के गरिमामयी सर्वोच्च न्यायालय का रक्षण हो तथा उसकी गरिमा एवं कानूनी प्राधिकार धूमिल न हो।
मोरो रघुनाथ (1 नेप, 5) के मामले जिसे याचिका के रूप में निर्देशित किया गया है, का संक्षिप्त विवरण इस प्रकार से है : 25 अगस्त, 1828 को बन्दी प्रत्यक्षीकरण के आदेश में पाण्डुरंग रामचन्द्र को मोरो रघुनाथ को पेश करने का निर्देश दिया गया। उसका संरक्षक, याचिकादाता न्यायाधीश ग्रांट के समक्ष दिनकर गोपाल देव के शपथ-पत्र के साथ उपस्थित हुआ, जिसमें कहा गया था कि मोरो रघुनाथ लगभग एक वर्ष से बन्दी हैं और अभी भी इच्छा के विरुद्ध पाण्डुरंग रामचन्द्र द्वारा बन्दी बनाया हुआ है और अत्यन्त कठिन एवं निर्दयी वातावरण में रह रहा है। इस प्रस्ताव का महाधिवक्ता ने इस आधार पर विरोध किया कि पाण्डुरंग रामचन्द्र और मोरो रघुनाथ स्थानीय निवासी हैं और सर्वोच्च न्यायालय की न्यायिक सीमा में नहीं आते। आदेश को स्वीकार किए जाने को विभिन्न कारणों से 30 अगस्त तक टाला गया, इस दौरान अतिरिक्त शपथ-पत्र दायर किये गये और इनमें कहा गया कि मोरो रघुनाथ 12 जुलाई को पाण्ड्रूरंग रामचन्द्र की कैद से भाग गया था और वापिस पकड़ लिया गयाऔर जान एन्ड्रज डनलप, एक ब्रिटिश नागरिक और पूना में प्रान्तीय