412 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
जज के आदेश एवं निर्देशों से वापिस उसको कैद में भेज दिया गया है। काफी विचार-विमर्श के पश्चात् आदेश जारी किये गए और 15 सितम्बर तक उत्तर देने के लिए कहा गया। न्यायालय के इस आदेश को मराठी भाषा में अनुवाद किया गया और पाण्डुरंग रामचन्द्र को सौंपा गया। पाण्डुरंग रामचन्द्र उपस्थित हुआ और अपनी याचिका इन शब्दों में दायर की।
मैं पाण्डुरंग रामचन्द्र दामोदर, पेशवा का रिश्तेदार एवं मित्र हूँ। मैं जीवन में अंग्रेज सरकार या अंग्रेजों का नौकर नहीं रहा हूँ। कम्पनी के इस देश को अधिग्रहण करते समय मुझे वचन दिया गया था कि मैं बिना भय या पीड़ा के रहूँ। इस भरोसे पर मैं पूना में रहा और जहाँ तक मेरे पौत्र मोरो रघुनाा का संबंध है, मैं उसका दादा हूँ, उसे मेरी देखरेख में छोड़ दिया गया कि सामान्य प्रथा के अनुसार मैं उसकी देखभाल करूँ। यह बच्चा चौदह वर्ष का है, हिन्दू शास्त्र के अनुसार वह नासमझ है, उसे उस व्यक्ति के आदेशों का पालन करना होगा जिसकी निगरानी में वह रह रहा है और इसके साथ, यह भी आवश्यक है कि बच्चे की सम्पत्ति एवं धन की देखभाल तथा सुरक्षा की जाए, इसके अतिरिक्त यहाँ ऐसा कुछ नहीं है और ऐसा कुछ नहीं किया सिवाय इसके कि बच्चे को मेरी सुपुर्दी में छोड़ा गया है क्योंकि मैं हिन्दू परिवार में वरीयता के क्रम में सबसे वरिष्ठ हूँ। संयोगवश मैं इसके साथ कुछ ज्यादती करता हूँ, तो उसकी जानकारी पूना में एड्वल्ट को दे दी जाए, तो ऐसा करना मैं तत्काल बन्द कर दूँगा। मोरो रघुनाथ की दादी के देहान्त के पश्चात् नियम एवं प्रथा के अनुसार उसे मेरी निगरानी में सौंप दिया गया था। मैंने उसकी देखभाल करने की सहमति दे दी ताकि मेरे पौत्र की सम्पत्ति नष्ट न हो। जिनकी सहमति से मैंने जो दायित्व संभाला है उनकी अनुमति के बिना इसे छोड़ नहीं सकता हूँ। दिनांक 10 सितम्बर, 1828 भाद्रपद सूद शालावार, 1750 सुरोधरी वर्ष की प्रथमा।
इस प्रत्युत्तर पर दो आधारों पर आपत्ति की गई, प्रथम कि यहाँ किसी बन्दी का प्रत्यक्षीकरण नहीं किया गया। दूसरा अवज्ञा को क्षमा करने का कोई कारण उल्लिखित नहीं किया गया है, यही कारण न्यायालय को मान्य नहीं होना चाहिए, और पाण्डुरंग रामचन्द्र के विरुद्ध कुर्की की कार्यवाही प्रारम्भ की जानी चाहिए थी। न्यायाधीशों ने प्रश्न पर विचार-विमर्श के लिए समय लिया और 29 सितम्बर को अपना निर्णय सुनाया कि बन्दी प्रत्यक्षीकरण पर याचिका दायर की जानी चाहिए, अगली सुनवाई 10 अक्तूबर को होगी।
बापू गणेश का मामला सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष बन्दी प्रत्यक्षीकरण का था। तन्नाह जेल के मुख्य जेलाधिकारी के विरुद्ध याचिका के संबंध में आया जिसमें उसे