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बापू गणेश को इस व्यक्ति को प्रस्तुत करने का निर्देश दिया गया था, जो उस समय उसकी कैद में था, बबूल रणजी के शपथ-पत्र पर याचिका स्वीकार की गई थी, शपथ-पत्र में कहा गया था कि उसने जेल-अधिकारी को उस वारण्ट की प्रति देने के लिए आवेदन किया था जिसके तहत् बापू गणेश को हिरासत में रखा गया था और इसकी प्रति उसको देने के लिए मना कर दिया गया था। आदेश 10 तारीख को जारी किया गया और सुनवाई 19 सितम्बर, 1928 के लिए रखी गई। उत्तरी कोणकण के एडाव्ल न्यायालय के नज़ीर द्वारा सुनवाई की गई और जेल-अधिकारी की याचिका पर इन शब्दों से निर्देश दिये गये -‘कि याचिका दायर करने से पूर्व उत्तरी कोणकण के जिला एडाव्लट न्यायालय के लिखित आदेश से बापू गणेश को पकड़ा गया और हिरासत में रखा गया। आदेश मराठी भाषा में इस प्रकार थे : जिसमें प्रारम्भ में इस प्रकार उल्लिखित किया गया है कि बापू गणेश धोखेधड़ी के अपराधी पाये जाने के कारण उनको दो वर्ष की जेल की सज़ा एवं 350 रुपये का जुर्माना किया जाता है और इस राशि का भुगतान न करने की दशा में एक वर्ष की अतिरिक्त जेल की सज़ा दी जाती है। कैदी को 19 तारीख को प्रस्तुत न किये जाने के कारण उत्तर को पढ़ने की अनुमति न्यायाधीश नहीं देंगे और निर्देश दिया कि जेल-अधिकारी के विरुद्ध कुर्की आदेश जारी कर दिया जाए। महाधिवक्ता के निर्देश पर 26 तारीख को लागत का भुगतान करने पर कुर्की आदेश हटा दिया गया और बापू गणेश को न्यायालय में लाया गया, प्रतिवाद पढ़ा गया और अपर्याप्त पाया गया क्योंकि एडाव्लट न्यायालय के अधिकार क्षेत्र का इसमें उल्लेख नहीं था। इसके संशोधन के लिए चार दिन का समय दिया गया, इस दौरान कैदी को बम्बई की जेल में रखा गया। नियत समय के भीतर प्रतिवाद का संशोधन नहीं किया गया था, महाधिवक्ता ने न्यायालय को कारण सूचित किया कि इसमें संशोधन क्यों नहीं किया जा सका। इसका कारण यह था कि सरकार द्वारा कथित मामले में प्रादेशिक न्यायालयों के अधिकार क्षेत्रों की अनुमति प्रदान नहीं की जा सकी और बापू गणेश को हिरासत से मुक्त कर दिया गया था।
डेनेमेन (कामन सरजेंट) और एल्डरसन, याचिकादाता के लिए - यह बिल्कुल स्पष्ट है कि सर्वोच्च न्यायालय के पास बन्दी प्रत्यक्षीकरण की याचिका जारी करने का अधिकार है। इस न्यायालय को राजा के शासनाधीन सभी मामलों में, बम्बई के क्षेत्र के किसी निवासी को किसी मामले में बन्दी बनाये जाने पर रिहा करने का आदेश जारी करने का अधिकार है।
सर्वोच्च न्यायालय, बम्बई ने अपनी अनेक शक्तियाँ वर्तमान राजा चतुर्थ के अधिनियम (8 दिसम्बर, 1823, देखें मोरले का डाइजेस्ट खण्ड-।। पृष्ठ 638) के अनुक्रम में चार्टर, जिसके अन्तर्गत इसका (सर्वोच्च न्यायालय) गठन किया गया है, से प्राप्त की है। हमारी ईस्ट इण्डिया कम्पनी के अधिकार क्षेत्र के न्यायालयों को ये शक्तियाँ प्रदान करने की आवश्यकता पूर्व शासनकाल में शोषण व अत्याचारों और