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गुलाम हैदर नाम के व्यक्ति को स्वीकृति प्रदान की गई कि ग्यारह वर्ष की बालिका सुम-जू को पेश करें क्योंकि उसने विवरण में कहा था कि बच्ची स्वेच्छा से उसकी देखरेख में है और न कि किसी दबाव में रह रही है। इसी वर्ष की 19 जनवरी को कलकत्ता में दीवानी अदालत के जेल अधिकारी को हुक्मनामा जारी किया गया कि बंचूराम राय का पोषण करे। इस हुक्मनामे पर शनिवार 21 जनवरी को वकील द्वारा आपत्ति की गई चूँकि यह च. II के अध्यादेश पर जारी किया गया था और परिस्थितियों के अनुसार नहीं था। मुख्य न्यायाधीश द्वारा दिये गये उत्तर में कहा गया कि हुक्मनामा सामान्य कानून के रूप में माना जा सकता है। तब एक प्रस्ताव हुक्मनामे को रद्द करने के लिए प्रस्तुत किया गया क्योंकि इंग्लैण्ड का सामान्य कानून भारत पर लागू नहीं होता था या ब्रिटिश मामले के अलावा किसी अन्य मामले पर लागू नहीं होता था परन्तु न्यायालय द्वारा यह प्रस्ताव रद्द कर दिया गया, 31 जनवरी को हुक्मनामे पर एक विवरण दाखिल किया गया और परिणामस्वरूप इस वाद को अस्वीकृत कर दिया गया। परन्तु जब इस वर्ष 2 मार्च को विवरण पुनः पढ़ा गया और इसमें उल्लेख किया गया कि दीवानी अदालत के न्यायालय के आदेश द्वारा ऋण के लिए दीवानी दावे में सज़ा दी जा सकती है, के संबंध में कलकत्ता के सर्वोच्च न्यायालय में जाँच करना प्रारम्भ किया कि क्या न्यायालय, जिसको कई मामलों में निःसन्देह सक्षम न्यायिक अधिकार प्राप्त हैं, तत्कालीन विचाराधीन मामले की जाँच करने के लिए सक्षम है। वादी ब्रिटिश शासनाधीश था और प्रतिवादी उसके अधीनस्थ है, इस प्रकार ब्रिटिश शासन के अधीन रोज़गार में होने के कारण दोनों पक्ष सर्वोच्च न्यायालय के क्षेत्राधिकारी के अधीन तर्क-वितर्क के लिए बाध्य हैं और दोनों में से कोई भी दीवानी अदालत के अधीन बाध्य नहीं है। जेल अधिकारी को न्यायालय में होने के कारण अपना विवरण तैयार करना था कि कैदी को रिहा कर दिया गया है। इस प्रकार सर्वोच्च न्यायालय ने अपने अधिकारों का प्रयोग करते हुए निर्दिष्ट किया कि प्रत्युत्तर के अनुसार कैदी को निचली अदालत के क्षेत्राधिकार में नहीं लाया जा सकता।
पुनः 28 मार्च, 1775 को फ़ौजदारी अदालत के जेल अधिकारी जौन मलिक ने बन्दी प्रत्यक्षीकरण के मामले में दिये निर्णय कि उसकी जेल के एक कैदी शेरेमणी का पोषण किया जाए, का उत्तर दिया। इसी वर्ष 23 दिसम्बर को बन्दी प्रत्यक्षीकरण के हुक्मनामे में माननीय गवर्नर जनरल वेरेन हेस्टिंग को निर्देशित किया गया कि जोसफ पावेसी (पृष्ठ नं० 32) का पोषण किया जाए, इसका भी उत्तर न्यायालय में दिया गया। माननीय गवर्नर जनरल ने किंचित आपत्ति को प्रदर्शित किये बिना स्वयं उत्तर तैयार किया और कथित पावेसी रिहा हो गया था। गवर्नर जनरल ने वास्तविकता को कहने से मना करते हुए संशोधित प्रतिवाद में उन्होंने जो रिपोर्ट