418 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
व्यक्तियों को मिलेगा जिन पर दीवानी मुकदमा चल रहा है।
फ़ौजदारी न्यायिक क्षेत्र के संबंध में उल्लिखित है कि चार्टर (अनुच्छेद 44) उक्त सर्वोच्च न्यायालय को अधिकृत एवं शक्ति प्रदान करता है कि राजा के अधीन किसी भी क्षेत्र या बम्बई सरकार पर आश्रित किसी भी व्यक्ति द्वारा राजद्रोह, हत्या, अत्याचार, दुराचरण आदि करने पर उसकी जाँच व सुनवाई करे तथा निर्णय करे। अब यदि चार्टर के अनुच्छेद द्वारा न्यायालय की शक्तियाँ क्षेत्र में रहने वाले नागरिकों के लिए सीमित थी, इसलिए यह अनुच्छेद अप्रासंगिक है। अतः यह मर्यादायें दर्शाती हैं कि इसकी सभी शक्तियाँ एवं प्राधिकार सभी पर लागू न किये जाए परन्तु केवल दीवानी न्यायिक क्षेत्र पर लागू किये जाएँ। इसका हल यह है कि प्रथमतः राजा की पीठ के न्यायालय की सामान्य शक्तियाँ पूना एवं थाने सहित पूरे जिले को प्रदान की जाएँ। इन कथित स्थानों को सर्वोच्च न्यायालय के अधीन सौंप दिया जाए, तब दीवानी अधिकार छोटे जिले के लिए प्रदान किए जाएँ और तब इसी प्रकार अधिकार छोटे-छोटे जिलों के लिए प्रदान किए जाएँ। इस प्रकार इस चार्टर की भाषा उसके सिद्धान्त, जिस पर आधारित है, के समान सुबोध बन गई है। मूल नागरिक अपने आशय की व्याख्या विदेशी कानून द्वारा नहीं करें, परन्तु यह समान रूप से महत्त्वपूर्ण है कि क्या मुकदमा किसी अन्य नागरिक या ब्रिटिश नागरिक से है और यह मामला व्यक्तिगत स्वतन्त्रता के अतिक्रमण के परिणामस्वरूप है। इसके बिना किसी प्रकार का कोई न्याय प्राप्त नहीं किया जा सकता। दीवानी एवं आपराधिक न्याय के साधारण मामलों के मध्य अंतर सुस्पष्ट है और अपने सभी नागरिकों की तत्काल सुरक्षा के लिए शासकों के पास विशेषाधिकार है। अपनी राजशाही गद्दी के कारण महामहिम को जो शक्तियाँ प्राप्त हैं, उनका प्रयोग राजा की पीठ के न्यायालय में न्यायाधीशों के माध्यम से किया जाएगा, यह शक्तियाँ विजित देशों के साथ-साथ उन देशों में भी लागू हैं जो राजा ने राज्याभिषेक के पश्चात् जीते हैं। ये उससे वापिस नहीं लिये जा सकते परन्तु वह विधानमण्डल की दो शाखाओं के साथ अपनी सहमति से कर सकता है, दूसरे शब्दों में कहा जाए कि इतना बड़ा त्याग करने के लिए कोई सन्देह न रहे।
इन अधिकार-पत्रों में यह भी प्रावधान है (अनुच्छे छ 45) : ‘‘कि सर्वोच्च न्यायालय गवर्नर जनरल एवं अन्य, जो निर्दिष्ट है, के विरुद्ध कुछ विशेष मामलों को छोड़कर दोषारोपण या सूचना पर मुकदमा चलाने के लिए सक्षम नहीं है।’’ अब मुकदमों की कार्यवाहियाँ एवं दोषारोपणों में आपराधिक सूचना की स्वीकृति प्रदान करना शामिल नहीं है फिर भी प्रावधान में स्पष्ट रूप से उल्लिखित है कि सभी मामले इससे अलग कर दिये गये हैं फिर भी यदि परिस्थितियाँ निर्देशित करें तो सर्वोच्च न्यायालय आपराधिक सूचना के लिए मामले पर सुनवाई कर सकता है।