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स्वानस्टन पी.1, में जाँच की गई। दिवालियेपन की स्थिति में मामलों की सुनवाई करने वाले आयुक्त ने एक व्यक्ति को संतोषजनक उत्तर न देने के लिए बन्दी बनाये जाने पर अवकाश के दौरान बन्दी प्रत्यक्षीकरण की याचिका के लिए एक प्रस्ताव तैयार किया, और इस पर यह प्रश्न उत्पन्न हुआ कि क्या जो अधिकार उनके पास हैं उन पर बारीकी से विचार-विमर्श किया गया है।‘ उसने लार्ड चान्सलर नौटिघंम (जेनकिस का मामला 1676, 6, टाउ स्ट.ट्र 1189) द्वारा निर्णित मामले को देखा परन्तु उसने दृढ़ता से उस निर्णय को अस्वीकार कर दिया जब उसने उसे ब्रिटेन के कानून के सिद्धान्त के प्रति असंगत पाया। उसने ऐसा व्यवहार किया जिससे यह लगे कि उसे कानून की जानकारी है कि किसी व्यक्ति की स्वतन्त्रता पर बिना सर्वोच्च कानूनी प्राधिकार के हस्तक्षेप न किया जाए तब तक कि प्रतिरोध के कारण पर तत्काल निर्णय देने का अधिकार न हो, और कि सम्राट का अधिकृत आदेश किसी भी समय कार्यान्वित किया जा सकता है और अधिनियम में सामान्य शब्दों द्वारा प्रभावित नहीं हो सकता।

मोरो रघुनाथ (1 नेप, 8) के मामले में बम्बई के गवर्नर एवं परिषद् ने असाधारण हस्तक्षेप किया उस मामले में यद्यपि बन्दी प्रत्यक्षीकरण के हुक्मनामा का कोई प्रत्युत्तर प्राप्त नहीं हुआ, बल्कि एक विचित्र, असंगत, संदेहात्मक दस्तावेज उस व्यक्ति से प्राप्त हुआ जिसको यह हुक्मनामा भेजा गया था। उस दस्तावेज में उल्लिखित वास्तविकता, यदि सत्य है, न्यायालय में प्रस्तुत की जानी चाहिए थी और कारण यदि पर्याप्त थे तो भी न्यायालय में प्रस्तुत किये जाने चाहिए थे। यदि कार्यवाही में भी उल्लिखित था कि व्यक्ति जिसको हुक्मनामा निर्देशित किया गया था, ने श्री डनलप, जो विश्व के उस हिस्से का शान्ति का न्यायाधीश, से अधिकार प्राप्त कर रखा था कि मोरो रघुनाथ को हिरासत में रखे और हमारी आशंका पर पूणतया विचार किया जाए कि क्या यह व्यक्ति श्री डनलप के एजेंट के रूप में नियुक्त था और इस प्रकार उनके संक्षिप्तम विवरण का उत्तर न्यायिक सीमा के भीतर दिया जाए।

यह कानून की कल्पना की अपेक्षा छोटी सी साहसिक धारणा है कि बन्दी प्रत्यक्षीकरण द्वारा समान प्रतिवाद के मामलों को न्यायालय के समक्ष लाया गया कि व्यक्ति विशेषाधिकारप्राप्त व्यक्ति है और इसलिए लार्ड एलडन और महामहिम न्यायाधीश ब्लैकस्टोन समान प्रतिवाद की संस्तुति करते हैं कि हिरासत में लिए जाने वाले व्यक्ति के पास विशेषाधिकार है जबकि इसकी जानकारी उस व्यक्ति को नहीं ह है क्योंकि कानून यह सहन नहीं कर सकता कि व्यक्ति जो अनुचित ढंग से हिरासत में है वापिस हिरासत में आये।