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स्थानीय या प्रान्तीय न्यायालयों के पास जो अधिकार थे वे अधिकार भारत पर ब्रिटिश की विजय से काफी समय पूर्व के थे और सिवाय उनके अभी भी लागू हैं, जिनको विधानमण्डल प्राधिकरण द्वारा परिवर्तित किया है और इनका ब्रिटिश संसद द्वारा प्रत्यक्ष रूप से प्रयोग नहीं किया जाता बल्कि परिषद में गवर्नर जनरल को सौंपे गये हैं। इस प्रकार सभी लोग सम्राट के न्यायालयों के अधीन न होकर अपने निजी कानूनों के अधीन ब्रिटिश विधानमण्डल के प्राधिकरण में रह रहे हैं और अनेक उद्देश्यों के लिए विभिन्न शासनों के अधीन एक अलग राष्ट्र के रूप में रह रहे हैं सम्राट की पीठ के न्यायालय के क्या अधिकार माने जाएँ ? पूर्व में सम्राट न्यायालय में अपनी प्रभु-सम्पन्नता का प्रयोग करता रहा है जिसका प्रयोग अब न्यायालय द्वारा किया जा रहा है, इसलिए अभी भी हमारे अधिपति का न्यायालय, राजा स्वयं राजा के समक्ष कहा जाता है। पूरे प्रशासन का आकलन प्राचीन न्यायालयों व सभी न्यायिक प्राधिकरणों को दृष्टिगत रखकर किया गया है और सभी बिना किसी अपवाद या भेद के सम्राट के न्यायालय सम्राट की पीठ के न्यायालय के नियंत्रण में है। परन्तु इंग्लैंड के कानून भारत के कानून नहीं हैं। यह कानूनी संहिता है जिसे सम्राट अपनी संसद की सहमति से उचित मानते हैं कार्यशील या अधिनियमित करता है और जो सम्राट के कानून नहीं हैं वे इंग्लैंण्ड के कानून हैं। अतः यहाँ परिस्थितियों में कोई समानता नहीं है। इंग्लैंण्ड में न्यायालय एक समान स्रोत से गठित किये जाते हैं और वे एक जैसी प्रक्रिया में कार्य करते हैं, ये कानून एक जैसे लोगों पर लागू होते हैं। परन्तु भारत में कानून विभिन्न स्रोतों से बनाये जाते हैं, वे विभिन्न वर्गों के व्यक्तियों से जुडे़ रहते हैं, इन कानूनों की ब्रिटिश कानूनों से कोई समानता नहीं होती है। कलकत्ता या बम्बई में स्थानीय रूप से लागू स्थानीय कानूनों एवं न्यायालयों पर नियंत्रण के लिए ब्रिटिश न्यायालय को अधिकार प्रदत्त करना असंगत न्यायिक असंगत न्यायिक प्रशासन की किस्म होगी, इसके लिए हमें विश्वास है ब्रिटिश विधानमण्डल इसे कभी भी स्वीकार नहीं करेगा।

वर्ष 1773 में सर्वोच्च न्यायालय के संस्थापन से पूर्व कलकत्ता, मद्रास एवं बम्बई में महापौर न्यायालय थे। 13 वें जियो- III (सी.63) का अधिनियम केवल कलकत्ता में सर्वोच्च न्यायालय के संस्थापन के लिए अधिकृत करता है। उस अधिनियम की भाषा और उस पर निर्धारित चार्टर से अनेक आलोचनायें होने लगीं। दूसरी ओर अनेक परिस्थितियाँ, जो पूर्व उदाहरण के रूप में देखी जाने लगी थीं, 21 वीं जियो- III (सी.70) से पूर्व घटित हुई परन्तु सर्वोत्तम सूचना जो हमें प्राप्त हुई, के अनुसार वर्ष 1781 (सी.70) में 21 वीं जियो- III के पारित होने तक ऐसा काई उदाहरण नहीं मिला है जिसमें तीनों प्रेजीडेंसियों में से किसी ने यह प्रयास नहीं किया कि बन्दी प्रत्यक्षीकरण का आदेश जारी किया जाए, जिसके संबंध में प्रतिवाद पर अब तक कार्य किया जा रहा है।