26 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
के रूप में मित्र राष्ट्रों के प्रतिनिधियों की एक परिषद का गठन किया जाए जो शांति की शर्तों के निर्धारण के लिए उनकी ओर से लड़ने को तैयार हों और विश्व में उनकी घोषणा कर दें ताकि सभी को और जर्मन लोगों को भी इसका पता चल जाए।
इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी की राय में इस घोषणा से बढ़कर मित्र देशों के सरोकारों के बारे में दुनिया को बेहतर तरीके से और कुछ समझाया नहीं जा सकता। इससे सब आश्वस्त हो जाएंगे कि मित्र देशों का दावा न्यायोचित शांति का है और यह हासिल कर लेने पर उसे बनाए रखने के लिए कृतसंकल्प हैं। केवल ऐसा युद्ध ही युद्ध को समाप्त करने वाला सच्चा युद्ध कहा जा सकता है। ऐसे युद्ध में किसी भी विचारशील व्यक्ति को शामिल होने में कोई हिचक नहीं होगी। भारत और साम्राज्य की विदेश नीति
इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी के विचार में इस स्थिति में एक अन्य दोष भी है, जो ग्रेट ब्रिटेन की मदद किए जाने में भारतीय लोगों की झिझक के दृष्टिकोण के लिए उत्तरदायी है। आज जैसी स्थिति है, उसमें भारत ब्रिटिश मंत्रिमंडल के रथ के पहिए से बंधा हुआ है। ब्रिटिश राजनेता किसी भी प्रकार की विदेश नीति अपनाने और कोई भी अंतर्राष्ट्रीय वचनबद्धता करने के लिए स्वतंत्र हैं। वे अपनी इच्छानुसार युद्ध की घोषणा करने अथवा न करने के लिए स्वतंत्र हैं और किसी भी प्रकार की शांति वार्ता करने के लिए स्वतंत्र हैं। उनकी विदेश नीति में युद्ध की घोषणा करने और शांति वार्ता करने में भारत की आवाज शामिल नहीं है।
यदि किसी प्रकार की विदेश नीति सफल रहती है तो भारत को इसका श्रेय नहीं मिलता। परन्तु यदि इस नीति की परिणति युद्ध में होती है तो भारत की जनशक्ति और धनशक्ति को तलब कर लिया जाता है।
युद्ध की शुरुआत करने वाले घटनाक्रम में भारत को ‘सुने जाने के अधिकार’ का कोई स्थान नहीं है। वे शर्तें तैयार करने में भी उसका कोई हाथ नहीं है, जिनके कारण युद्ध विराम के स्थान पर युद्ध स्थगित हो जाता है। उसका कर्त्तव्य तो युद्ध होने पर युद्ध क्षेत्र की ओर कूच करना है। यदि कम से कम शब्दों में कहें तो ऐसी स्थिति भारत जैसे देश के लिए विसंगतिपूर्ण और अनुचित है।
निर्विवाद अधिकार
यह सच है कि वर्सेलिस संधि के समय भारतीय प्रतिनिधियों को संधि की शर्तों को अनुप्रमाणित करने की अनुमति दी गई थी। परन्तु शांति की शर्तें तैयार कर लेने