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पर उन्हें अनुप्रमाणित करने का अवसर भारत के लिए कोई प्रतिपूर्ति नहीं है। ब्रिटिश साम्राज्य की विदेश नीति में भागीदारी का भारत का दावा अपेक्षाकृत अधिक है और शांति की शर्तें तय करने में किसी उपनिवेश से अधिक है।
उपनिवेशों को तटस्थ रहने का अधिकार होता है। तदनुसार जिस विदेश नीति की उपयुक्तता एवं औचित्य को वे मंजूर नहीं करते उसके परिणामस्वरूप हुए युद्ध के दुष्परिणामां को भोगने के लिए बाध्य नहीं हैं। परन्तु भारत ऐसे किसी युद्ध से बच नहीं सकता, जिसमें ब्रिटिश मंत्रिमण्डल ने अपने आपको शामिल कर लिया हो। यदि भारत को किसी युद्ध अथवा शांति हेतु वचनबद्ध करना है तो यह उसका पूर्ण अधिकार है कि उससे परामर्श किया जाये। खेद है कि आज ऐसा नहीं हो रहा है।
सभी राष्ट्रों को खतरा
इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी ने झिझक के इन सभी आधारों पर विचार किया है। इस बात से इंकार नहीं किया जा सकता कि ये सभी अत्यंत महत्वपूर्ण हैं। यदि केवल पोलैण्ड को बचाने के किए युद्ध लड़ा जा रहा होता तो वह और ज्यादा निर्णायक शक्ति हासिल करते। क्योंकि इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी की राय में पोलैण्ड का पक्ष लेना कोई अनुकरणीय कार्य नहीं है। पोलैण्ड, लोकतंत्र की हत्या बहुत पहले कर चुका है। जर्मन लोगों ने यहूदियों से जो व्यवहार किया पोलैण्ड ने उससे भी क्रूरतापूर्ण व्यवहार उनसे किया। पोलैण्ड तो इस आपातकाल में भी रूस की सहायता लेकर बचने के बजाए मरने के लिए तैयार है। लेकिन जैसा कि इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी का आकलन है, युद्ध केवल पोलैण्ड के लिए नहीं लड़ा जा रहा है।
पोलैण्ड का मुद्दा युद्ध की केवल एक घटना है। इससे कोई भी इंकार नहीं कर सकता कि जर्मनी और पोलैण्ड के बीच युद्ध का गहरा महत्व है और व्यापक आधार है। यह एक ऐसा युद्ध है जिसमें जर्मनी का दावा है कि वह अनेक राष्ट्रों में से मात्र एक राष्ट्र ही नहीं है बल्कि उसे तो शेष राष्ट्रों से ऊपर और उत्कृष्ट माना जाना चाहिए, जिसकी इच्छा को निर्विवाद रूप से माना जाएगा और उसकी अवज्ञा करने की स्थिति में उससे असहमत राष्ट्र पर उसे हिंसा द्वारा अपनी इच्छा को थोपने का अधिकार होगा। ऐसा दावा न केवल पोलैण्ड बल्कि सभी राष्ट्रों के लिए खतरा है। भारत का अपमान
ऐसी स्थिति में जाहिर है कि जो राष्ट्र यह मानते हैं कि सभी राष्ट्र बराबर हैं और प्रत्येक को जीवन जीने का समान अधिकार है, वे अपने अनुयायियों से बाधित