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गया है तो न्यायिक क्षेत्र का तर्क समाप्त हो जाता है और यदि न्यायिक क्षेत्र रहता है परन्तु यह यहाँ भिन्न है क्योंकि उन न्यायालयों जिनके न्यायिक क्षेत्र जहाँ तक इनके साथ जुड़े हैं उनके साथ समन्वय करने पर इस न्यायालय का न्यायिक क्षेत्र ब्रिटिश नागरिक न होने के कारण सीमित है।’’

यह अनुच्छेद हमारे अनुसार सभी विचारणीय विषयों पर लागू होता है। यद्यपि इस चार्टर में ऐसे शब्द हैं जो न्यायालय को सम्राट की पीठ के न्यायालय को अधिकार प्रदान करते हैं, यह अधिकार की प्रकृति है जिसका वर्णन किया गया है और न्यायिक क्षेत्र की सीमा नहीं दी गई है। अन्य अनुच्छेदां द्वारा न्यायिक क्षेत्र की सीमा सीमित है परन्तु अधिकार की प्रकृति है जिसका न्यायाधीश को प्रयोग करने का हक है परन्तु उनका न्यायिक क्षेत्र कहाँ है, निवासियों के संबंध में स्थानीय सीमायें क्या हैं तथा ब्रिटिश नागरिकों के लिए क्या हैं ? क्या यह ब्रिटिश कानून इंग्लैण्ड में सम्राट की पीठ के न्यायालय द्वारा प्रयोग किए जा रहे अधिकारों की प्रकृति के अनुसार है तथा लागू करने के लिए स्थानीय न्यायिक क्षेत्र से बाहर हैं। सर थामस स्ट्रेन्ज ने (पृष्ठ 136) बोलते हुए कहा कि मद्रास के मूल निवासियों के लिए सीमित है (क्या विवेकशीलता है या नहीं, यह हमारा विचारणीय विषय नहीं है) और तर्क इन तथ्यों तक सीमित हैं जिसके लिए न्यायालय को स्पष्ट रूप से अपना वक्तव्य देने के लिए कहा गया है क्या प्रतिवादी स्थानीय निवासी होने के कारण हमारे वर्तमान विधेयक में न्यायिक क्षेत्र के उद्देश्य के लिए मद्रास का निवासी माना जा सकता है। अनेक मामलों में न्यायिक क्षेत्र के उद्देश्य एवं मामलों में न्यायाधीश पर निर्भर करेगा जहाँ तक परिस्थितियाँ स्वीकृति दें, व्यापक एवं विस्तृत न्याय करे तथा हर दृष्टिकोण से मामले की सभी पार्टियों के हितों और सभी अभिप्रायों का सम्मान करें। मुझे ऐसा लगता है कि प्रत्येक न्यायिक क्षेत्र की शक्ति मुख्यतः उनके द्वारा उचित विभाजन पर निर्धारित की जानी चाहिए। न्यायाधीशों के पास सत्ता में बैठे अन्य न्यायाधीशों के लिए उदाहरण प्रस्तुत करने के बजाए भ्रान्तिपूर्ण कार्य कर रहे हैं और इस पर कृत्रिम कल्पनायें की जा रही हैं और उनके आयोग द्वारा नियत सीमाओं की उपेक्षा की जा रही है। हम में से कोई भी यह नहीं मानेगा कि न्याय नहीं होगा जब तक यह न्यायालय तर्क का संरक्षण करते हुए प्रतिपादन के कार्यालय की ओर अपना रुझान नहीं बनायेंगे।

विभिन्न अधिनियमों में पाये जाने वाले अनेक अनुच्छेद पूरी तरह से यह दर्शाते हैं कि शायद भारतीय मूल के सभी नागरिकों को सर्वोच्च न्यायालय के न्यायिक क्षेत्र से छूट मिली हो परन्तु सर्वोच्च न्यायालय के प्राधिकरण ने उन्हें कभी अंगीकार नहीं करना चाहा, और कि उन्हें कभी इतने व्यापक अधिकार नहीं प्रदान किये गये जो