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432 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

ब्रिटिश नागरिकों के संबंध में सर्वोच्च न्यायालय को प्रदत्त थे।

महामहिम आप जियो- III के 53 वें कैप.155 में, विभिन्न धाराओं के अन्तर्गत किये गये अपराधों की लम्बी सूची पाएँगे, इन सभी धाराओं में न्यायालय के स्थानीय एवं निजी कार्यक्षेत्रों में स्पष्ट रूप से व्याख्या की गई है। धारा 114 का वर्णन करने के पश्चात् यह व्यावहारिक होगा कि ईस्ट इण्डिया के भीतर राशि का भुगतान करने के लिए प्रतिभूतियों की चोरी को एक घोर अपराध माना गया और यह अधिनियमित किया कि फोर्ट विलियम फोर्ट सेन्टजार्ज, बम्बई, या प्रिन्स ऑफ वेल्स महाद्वीप में महामहिम के किसी न्यायालय की आपराधिक न्यायिक क्षेत्र की स्थानीय सीमा या कोई व्यक्ति जो व्यक्तिगत रूप से ईस्ट इण्डिया में किसी स्थान पर उक्त न्यायालयों के स्थानीय और न्यायालय के व्यक्तिगत न्यायिक क्षेत्र में आता है, की भिन्नता को मान्य किया गया और यहाँ ऐसे लोग भी हैं जो स्थानीय न्यायिक सीमाओं में आते हैं परन्तु व्यक्तिगत न्यायिक सीमा में नहीं आते हैं, वो स्थानीय एवं व्यक्तिगत न्यायिक क्षेत्र की भिन्नता को स्वीकृति प्रदान करते हैं।

तब ये प्रश्न उत्पन्न होता है कि क्या एक मूल नागरिक जो प्रान्तीय न्यायालय का एक अधिकारी उदाहरणार्थ एक जेल अधिकारी और जिसे ईस्ट इण्डिया कम्पनी की सेवा का एक व्यक्ति माना जाता है, जिसे बन्दी प्रत्यक्षीकरण का अधिकार है और जेलाधिकारी के रूप में अपनी हिरासत में कैदी के रूप में मूल नागरिक को बम्बई के सर्वोच्च न्यायालय के समक्ष प्रस्तुत कर सकता है। हम यदि यह मानने में सही हैं कि प्रान्तीय न्यायालयों की कार्यवाहियों पर सर्वोच्च न्यायालय को नियन्त्रण देने का कभी आशय नहीं रहा है, यदि प्रान्तीय न्यायालयों से उच्चतम अपीलीय ट्रिब्युनल तक अपीलों के और सर्वोच्च न्यायालय द्वारा पारित एवं इस बोर्ड द्वारा महामहिम के समक्ष न्यायोचित की प्रक्रिया से पूर्णतया भिन्न कार्यवाही किये जाने वाले पर्याप्त महत्ता के मामले में उत्तराधिकार स्थापित किये जाने की स्थिति कैसी होगी। यह अत्यन्त महत्वपूर्ण प्रश्न है कि क्या वर्ष 1773 और 1781 के मध्य घटित घटनाओं के अनुरूप आधार पर कार्यवाही की प्रक्रिया को पूरी तरह से टाल दिया जाए। उस समय अनेक मूल-निवासियों चूँकि उनके पास भूमि थी या विभिन्न कार्यकलापों में कार्यरत थे, को संसद के अधिनियम और चार्टर की अभिव्यंजना पर तर्क करते हुए उन्हें ईस्ट इण्डिया कम्पनी को सेवा कर्मी मानते हुए सर्वोच्च न्यायालय के न्यायिक क्षेत्र में रखा गया। तर्क के लिए यह मान लिया जाए कि वह कम्पनी का सेवा कर्मी है और इस प्रकार यदि वह हिरासत में रखा जाता है तो जब भी आवश्यकता होगी तो इस कैदी को प्रत्यक्ष रूप से न्यायालय में प्रस्तुत किया जायेगा। इसलिए क्या यह मान लिया जाए कि कम्पनी का कर्मचारी होने के नाते न्यायालय को अधिकार