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होगा कि ऐसे व्यक्ति को बन्दी प्रत्यक्षीकरण के लिए निर्देशित करें। हिरासत में रखे हुए व्यक्ति को स्थानीय न्यायालय में एक कैदी के रूप में लाएँ। क्या इससे सर्वोच्च न्यायालय को अधिकार होगा कि न्यायालय के संविधान की जाँच करें (जिसके लिए दृढ़तापूर्वक कहा गया है) और इसकी कार्यवाही की समीक्षा करें ? यह कहा गया है कि न्यायालय के समक्ष सभी विनियम एवं कानून होने चाहिए जिनसे प्रान्तीय न्यायालयों का गठन किया गया था, क्या ऐसे न्यायालय मुगल शासन, जहाँ अभी तक परिवर्तित नहीं हुए हैं या संसद द्वारा सरकार को अधिनियम बनाने के लिए दिये गये अधिकार के अन्तर्गत स्थापित नये न्यायालय हैं। तर्कशील सिद्धान्त के अनुसार इन सबको न्यायालय के समक्ष प्रतिप्रेषित किया जाए, प्रथमतः सर्वोच्च न्यायालय में यह निर्णय करने के लिए क्या प्रान्तीय न्यायालय कानूनी रूप से गठित किया गया, इसकी कार्यवाही उचित रूप से संचालित की जा रही है। हम अनुभव करते हैं कि संसद एवं चार्टर के अधिनियमों की पूरी गतिविधियों से स्पष्ट होता है कि ऐसा कोई न्यायिक अधिकार प्रदान करने का अभिप्राय नहीं था। 21वें जियो- III (सी.70), धारा 23 के अधिनियम में यह अधिनियमित है कि गवर्नर जनरल और परिषद को प्रान्तीय न्यायालयों एवं परिषदों के लिए समय-समय पर विनियम तैयार करने के लिए शक्ति एवं अधिकार हांंगे। इन प्रान्तीय न्यायालयों की विधान मण्डलीय मान्यता भिन्न होगी। इसी प्रकार की शक्ति मद्रास एवं बम्बई सरकारों को भी दी गई हैं कि अपनी-अपनी प्रेजीडेन्सी में प्रान्तीय न्यायालयों की कार्यवाहियों एवं परिषद में महामहिम द्वारा संशोधित सभी विनियमों को विनियमित करें।

इन सब को निर्देशित किया गया है कि इनको राज्य के सचिव को प्रतिप्रेषित किया जाए और यदि इनमें कोई बदलाव नहीं किया गया है तो ये प्रान्तों के कानून होंगे जिनके द्वारा वे न्यायालय अधिशासित होंगे। अतः यह बिल्कुल स्पष्ट है कि विधानमण्डल ने इन न्यायालयों के अस्तित्व को स्पष्ट रूप से मान्यता उस रूप में प्रदान की है, जिस रूप में यह विनियमित है और जिस कानून द्वारा यह अधिशासित है। प्रान्तों के शासन के विनियमन के लिए सर्वोच्च न्यायालय में पंजीकरण की आवश्यकता नहीं है जबकि कलकत्ता, मद्रास और बम्बई के निवासियों तथा सभी ब्रिटिश नागरिकों पर लागू होता है, कि वे इन न्यायालयों में पंजीकृत एवं अनुमोदित होने चाहिए।

अब हम इस धारा (धारा 24) पर चर्चा करते हैं : किसी व्यक्ति, जो देश के न्यायालय में किसी भी न्यायिक कार्यालय में कार्यरत हो, के विरुद्ध सर्वोच्च न्यायालय में गलत अन्याय करने के लिए, कोई कार्यवाही नहीं की जा सकती। इसके साथ ही उक्त न्यायालय के किसी निर्णय, डिग्री या आदेश के विरुद्ध और न ही उक्त