434 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
न्यायालय के किसी व्यक्ति के विरुद्ध किए गये कार्य या उस के आदेश की वजह से कोई कार्यवाही नहीं की जा सकती ताकि एक स्थानीय निवासी ईस्ट इण्डिया कम्पनी की सेवा के अधीन प्रान्तीय न्यायालय में एक अधिकारी के रूप में सेवारत होना चाहिए और ब्रिटिश नागरिक ऐसे न्यायालय का न्यायाधीश होना चाहिए और उसके द्वारा किए गये न्यायिक कार्यों के लिए उसके विरुद्ध कोई कार्यवाही नहीं हो सकती। चार्टर में भी यही भाषा पाई जाती है परन्तु हालाँकि मुकदमे के लिए किसी कार्यवाही की स्वीकृति नहीं है चाहे मामला सर्वोच्च न्यायालय में कानूनी है या नहीं, फिर भी यह तर्क दिया जाता है कि कार्यवाही की कानूनी मान्यता की जाँच बन्दी प्रत्यक्षीकरण की मान्यता के माध्यम से कराई जाए। यह एक असाधारण तर्क प्रतीत होता है और यह देखते हुए कि किसी भी अधिनियम में इस संबंध में कोई प्रावधान नहीं है फिर भी हम यह कहने का साहस कर रहे हैं कि आदेश जारी करने का कोई आधार नहीं है।
अब हम बम्बई को हाल ही में प्रदत्त चार्टर पर विचार करते है (मॉरले डि.
खण्ड-।। पृष्ठ-638)। इस चार्टर में एक धारा है जिस से पूरा प्रश्न बदल जाता है और उसके लिए तर्क का कोई आधार नहीं बनता। यह धारा (धारा 10) इस प्रकार से है : कि उक्त मुख्य न्यायाधीश और उक्त अधीनस्थ न्यायाधीशों को एतद्द्वारा सम्मानपूर्वक रूप से पूरे बम्बई शहर और बम्बई के नगरों एवं द्वीपों और उनकी सीमाओं में और इनके अधीनस्थ फैक्टरियों में और उक्त कथित बम्बई शासन के अधीन वर्तमान तथा इसके बाद भविष्य में इसके अधीन आने वाले सभी क्षेत्रों में शान्ति के संरक्षक एवं असामयिक मृत्यु की जाँचकर्ता के रूप में नियुक्त किया जाता है और इनका वही न्यायिक क्षेत्र एवं अधिकार होगा जो सम्राट पीठ के हमारे न्यायालयों के हमारे न्यायाधीशों को प्रदत्त है और जहाँ तक परिस्थितियाँ स्वीकृति प्रदान करती हैं ग्रेट ब्रिटेन के एक हिस्से इंग्लैण्ड मे कानूनी रूप से प्रयोग करते हैं। अब इस धारा की व्याख्या करना संभव है इसके बजाय कि यह कहना कि वे सम्पूर्ण बम्बई प्रेजीडेन्सी में न्यायाधीश एवं शान्ति के संरक्षक होंगे और ऐसी न्यायिक सीमा एवं प्राधिकार होगा जिसमें मामले के अनुरूप निर्णय दिया जाएगा। चूँकि ये ऐसे न्यायाधीश एवं शान्ति के संरक्षक होंगे जैसे सम्राट की पीठ के हैं तथा जिन्हें हम शान्ति के न्यायाधीश के रूप में मानते हैं इन्हीं के अनुरूप परिस्थितियों के अनुसार जिस प्रकार सम्पूर्ण ब्रिटिश साम्राज्य में अधिकारों एवं शक्तियों का प्रयोग किया जाता है, उसी के अनुरूप अधिकारों एवं शक्तियों का प्रयोग करेंगे। निस्संदेह सर्वोच्च न्यायालय के न्यायाधीश सम्पूर्ण प्रान्तों में सभी के साथ ब्रिटिश नागरिकों के समान व्यवहार करेंगे और इस प्रकार उनकी न्यायिक सीमा सम्राट के पीठ के न्यायाधीशों,