92. और लार्ड ने - तक कहा - Page 459

440 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

बन्दी प्रत्यक्षीकरण का आदेश निर्देशित किया गया था। यदि आदेश जारी करने के अधिकार प्रदान किये जाते हैं और ऐसे आदेश प्राप्त होने पर न्यायालय के अधिकार के अधीन कार्य करता है तो उसे प्रेजीडेन्सी के समक्ष व्यक्ति को पेश करना होगा या उसे हिरासत में रखने का विस्तृत विवरण प्रस्तुत करना होगा कि उसको किसने हिरासत में रखा और अन्य संबंधित जानकारी प्रस्तुत की जाए। ऐसे अधिकारी इतनी सूक्ष्मता/सुनिश्चितता से परिस्थितियों का उल्लेख कर सकते हैं ताकि आपत्तियों का निवारण किया जा सके। दिल्ली या पूना में तैयार किया गया बन्दी प्रत्यक्षीकरण का नियम हमारी शैली के अनुसार पूर्णतया दोषपूर्ण पाया जायेगा जिन्होंने इन नियमों को तैयार किया होगा उन्होंने उन के द्वारा तर्कों को नजर अंदाज नहीं किया जा सकता था और यह स्पष्ट है कि उन्होंने मामले को इतना गंभीर हो जाने के संबंध में नहीं सोचा होगा।

महामहिम आपका ध्यान इस परिस्थिति की ओर आकर्षित करना महत्त्वपूर्ण समझते हैं कि प्रान्तीय न्यायालयों की स्थापना एवं विनियम के लिए विभिन्न अधिनियमों में अपील की व्यवस्था सहित प्रावधान किये जाएँ। 37वें जियो III केप 142 धारा 8 के द्वारा गवर्नर जनरल के स्थानीय नागरिकों पर लागू होने वाले विनियमों को संहिता के रूप में बनाया जाए तथा इन्हें सभी स्थानीय भाषाओं में मुद्रित करवाया जाए ताकि स्थानीय नागरिक जान सकें कि नियम क्या हैं जिनका उनको पालन करना है। स्व. मारक्यूस कार्नवालिस ने सर्वप्रथम यह कदम उठाया था और इतना लाभकारी सिद्ध हुआ कि इसे बाद में विधानमण्डल द्वारा स्वीकार कर लिया गया और देश के कानून का एक हिस्सा बना दिया।

उनके प्रेजीडेन्सियों में नियमित रूप से प्रांतीय न्यायालयों की स्थापना इस उत्तराधिकार के साथ होती रही कि ये आपराधिक एवं सिविल मामलों में निचली अदालतों से उच्चतम अपीलीय न्यायिक क्षेत्रों की अपीलें सुन सुकेंगे। भारत में सिविल मामलों की अलीपों की सुनवाई के लिए सुदूर दीवानी अदालत सबसे बड़ा न्यायालय था जबकि आपराधिक मामलों मं अपीलों की सुनवाई के लिए सुदूर निजामत अदालत सबसे बड़ा न्यायालय था। इन दोनों न्यायालयों को 53वें जिया III (सी. 155) के अन्तर्गत मान्यता प्राप्त थी। यह भी प्रावधान किया गया था कि सर्वोच्च न्यायालय के माध्यम से भारत में अपीलीय न्यायालयों से 5000 पौंड से अधिक के मामलों के संबंध में महामहिम की परिषद में अपील की जा सकती है। बम्बई में न्याय के न्यायालयों से संबंधित अनेक विनियमों पर बाद में काफी मश्क्कत एवं सावधानी से समीक्षा कर एक संहिता को रूप दिया गया। यह संहिता वर्ष 1827 में प्रकाशित हुई और