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यह स्पष्ट रूप से दर्शाती है कि नागरिकों के संरक्षण के लिए काफी मेहनत करनी पड़ी ताकि महामहिम के साम्राज्य के किसी भाग में, बम्बई के प्रान्तीय न्यायालयों या न्यायाधीशों से मिले अन्याय का निवारण किया जा सके।
व्यक्तियों की अनुचित रूप से हुई हिरासत के लिए विशिष्ट विनियम हैं जिनके निष्पादन के लिए सभी न्यायाधीश अपनी शपथ द्वारा बाध्य हैं; और यदि उनका आचरण भ्रष्ट होता है तो उनके विरुद्ध सर्वोच्च न्यायालय में कार्यवाही की जा सकती है जिसके लिए अधिनियम में विशेष प्रावधान है। विनियम 12 में वरिष्ठ मेजिस्ट्रेट द्वारा अपने अधीनस्थ अधिकारियों का अधीक्षण करने की विधि इंगित है और विनियम 13 में उल्लिखित है कि न्यायधीश को यह सुनिश्चित करने के लिए सभी लेजों का दौरा करना होगा कि क्या व्यक्ति गैर कानूनी रूप से हिरासत में हैं, उसे आपराधिक एवं सिविल जेलों में इस लिए दौरा करना होगा कि संबंधित अधिकारियों की जानकारी में गलत या भ्रांतिपूर्ण निर्णय लाना होगा ओर ताकि आवश्यक हो तो मामला सुदूर फौजी अदालत में संशोधित निर्ण के लिए प्रेषित किया जा सके।
यहाँ यह कहने का कोई इरादा नहीं है कि एक व्यक्ति जो कम्पनी की सेवा में प्रांतीय न्यायालय में एक अधिकारी के रूप में कार्यरत है इसलिए जिन मामलों में वह एक व्यक्ति के रूप में काम कर रहा है उसे सर्वोच्च न्यायालयों की न्यायिक सीमा में छूट है परन्तु यह घोषित किया जाता है कि यदि वह प्रांतीय न्यायालय के आदेशों स किसी व्यक्ति का हिरासत मेंलेता है तो न तो वह इस कार्य के लिए कार्यवाही का दोषी है और न ही न्यायाधीश पर कोई कार्यवाही की जा सकती है। सर्वोच्च न्यायालय में उसके विरुद्ध कोई कार्यवाही भ्रष्टता के मामले में सूचना क आधार पर की जा सकती है। जब किसी व्यक्ति को प्रांतों में न्यायालयों क आदेशों से हिरासत में लिया जाता है तो सर्वोच्च न्यायालय इस व्यक्ति को उसके मामले की जांच करने के उद्देश्य से लाने के आदेश नहीं द सकता कि न्यायालय का न्यायालयों पर अधीक्षण पर ऐसा कोई न्यायिक अधिकार नहीं होगा, इसके लिए महामहिम कोक ने अपने चतुर्थ विधि संग्रह में उल्लिखित किया है कि सम्राट की पीठ के न्यायालय को वे अधिकार हैं जो सर्वोच्च न्यायालय को प्रदान नहीं किये गये हैं, कारण वह देश की सभी निचली अदालतों का अधीक्षण करने एवं ज्यादती को रोकने का अधिकार होगा और परिणामस्वरूप याचिका में उल्लिखित मामलों में नागरिक स्वतंत्रता/बंदी प्रत्यक्षीकरण के जारी किये गये आदेश गैर कानूनी हैं।
श्री डेनमेन ने अपने उत्तर में कहा है- बम्बई के सर्वोच्च न्यायालय को निर्णायक