442 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
न्यायालय बनाया जाए, इसके पास इंग्लैण्ड में सम्राट की पीठ के न्यायालय का न्यायिक क्षेत्र भी है और न्यायालय के लिए अनिवार्य हो कि वर्तमान अधिकार प्रतिपादित किये जाएं।
याचना न्यायालय एवं त्रैमासिक न्यायालय को अधिकार (खण्ड 59 मारले डाइनेस्ट II. पृष्ठ 677 प्रदान किये गये कि अनुदेश समादेश कार्यवाही करने या गलत करने संबंधी आदेश जारी करें इसकी अवमानना करने या जानबूझकर अवज्ञा करने पर जुर्माना या कारावास द्वारा सजा दी जाए। अब यह प्रश्न पूछा जाए कि चार्ट्र में ये विवरण क्यों दें जबकि ये पहल से ही सामान्य अधिकार-पत्र में सम्मिलित हैं। तब क्या ये प्रथम बार है कि संसद के ब्रिटिश अधिनियम के सभी दस्तावेजों में अनावश्यक अधिकार सृजित किये गये या प्रयोग किये गये नियमों को दिखाया जा सकते है जहाँ वे स्पष्ट आशय द्वारा अतिक्रमण या अतिश्योक्ति जैसी पुनरुक्ति का पता लगाया जा सके। जब तक इस सीमा तक तर्क नहीं किया जायेगा तब तक यह किसी महत्त्व का नहीं है और यह उचित रूप से उस सीमा तक नहीं ले जाया जा सकता चूंकि प्रत्येक सत्रा का अनुभव कुछ जानकारी देता है।
परन्तु यदि यह धारा किसी बात को सिद्ध करती है तो इससे काफी कुछ सिद्ध हो जाता है। इसमें केवल अनुदेश समादेश कार्यवाही करने और गलती के आदेश निर्देशित किये गये हैं। परन्तु सभी द्वारा यह कहा गया है कि बंदी प्रत्यक्षीकरण नागरिक स्वतंत्रता के आदेश लगातार जारी होते रहते हैं और यदि नहीं तो दोष-सिद्ध पर सजा एवं मैजिस्ट्रट के आदेशों को समापत करने के लिए समादेश की महत्ता बहुत कम होगी। एक व्यक्ति जो न्यायिक निर्णय द्वारा दोषी ठहराया गया था, के विरूद्ध निर्णय को अस्वीकृत क्यों कर दिया गया, यदि एक व्यक्ति अपने आप ही जेल में रहना चाहता है तो नागरिक स्वतंत्रता का आदेश उसका बचाव नहीं कर सकता?
यह स्वीकृत है कि बंगाल में फोर्ट बिलियम में बंदी प्रत्यक्षीकरण का आदेश जारी करने के लिए कोलकता का सर्वोच्च न्यायालय अधिकृत है अतः वर्तमान महामहिम (4 जियो. 4 सी 71) के चतुर्थ में वर्णित के अनुसार बम्बई क्षेत्र में यह अधिकार सर्वोच्च न्यायालय को है।
यह न्यायालय ‘‘बम्बई के नगर एंव द्वीप और इसकी सीमायें और इससे जुड़ी फैक्टरियों और फैक्टरियों के भीतर जो अब है या इसके बाद जो होगी, की शर्त एवं इस पर अवलम्बित रहते हुए, सभी के लिए उपरोक्त उल्लिखित बंगाल में फोर्ट