444 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
का अधिकार नहीं देती, परन्तु इस अधिकार के अस्तित्व पर प्रश्न नहीं किया जा सकता, चूंकि इसका हमेशा से प्रयोग होता रहा है और कब से व कैसे लागू है, इस संबंध में जानकारी नहीं है परन्तु सर्वोच्च न्यायालय का ब्रिटिश साम्राज्य पीठ के सभी कार्यकलापों के साथ स्थापित किया गया था, हमारे पास यहां एक और प्रमाण है कि इसे स्थापित करना मात्रा एक सूत्र से अधिक है और उसने पूर्ण अधिकार प्राप्त किया ह। शवें जियो. III (सी 70) के अधिनियम में किया गया भेद आसानी से नहीं समझा जा सकता, क्या उसका वास्तविक उद्देश्य 13वें जियो. III (सी 63) को उसके विस्तृत कार्यक्षेत्र से रोकना था, यह संशोधन साधारण विनियम द्वारा भी किया जा सकता था।
इस मामले में कोई निर्णय नहीं दिया गया परन्तु महामहिम द्वारा पुष्टि की गई प्रिवी परिषद की रिपोर्ट निम्न प्रकार से थी।
‘‘कि उक्त याचिका में उल्लिखित बंदी प्रत्यक्षीकरण के दो मामलों में दिये गये निर्णय अनुचित थे।’’ कि सर्वोच्च न्यायालय को बंदी प्रत्यक्षीकरण आदेश जारी करने की शक्ति या अधिकार नहीं है सिवाय जब कि व्यक्ति उस स्थानीय सीमा में रह रहा हो जहां न्यायालय की सामान्य न्यायिक सीमा हो या व्यक्ति उस स्थानीय सीमा से बाहर रह रहा हो और व्यक्तिगत रूप से सर्वोच्च न्यायालय की सिविल एवं आपराधिक न्यायिक सीमा के अंतर्गत आता हो।
‘‘कि सर्वोच्च न्यायालय को बंदी प्रत्यक्षीकरण का आदेश जेल अधिकारी या स्थानीय न्यायालय को जारी करने की शक्ति या अधिकार नहीं है, सर्वोचच न्यायालय को स्थानीय न्यायालय के अधिकार से हिरासत में लिए व्यक्ति को रिहा करने का अधिकार नहीं है।
‘‘कि सर्वोच्च न्यायालय को स्थानीय न्यायालय की न्यायिक सीमा की जानकारी रखनी होगी बंदी प्रत्यक्षीकरण के आदेश में विशिष्ट रूप से नियत की गई न्यायिक सीमा नहीं होगी।’’
नोट- इस निर्णय की घोषणा से पूर्व निम्न परिस्थितियों में बंबई सर्वोच्च न्यायालय नोट-
बंद हो गया। पाण्डुरंग रामचन्द्र को निर्देशित करने वाले बुंदी प्रत्यक्षीकरण के आदेश की प्रत्तयुतर में 10 अक्टूबर, 1828 को कोई उपस्थित नहीं हुआ। बंदी प्रत्यक्षीकरण के आदेश जारी कर तुरन्त उपस्थित होने का आदेश जारी किया जाए और 10,000 रुपये का जुर्माना किया जाए। इस आदेश के बाद भी कोई उपस्थित नहीं हुआ और