92. और लार्ड ने - तक कहा - Page 464

445

23 फरवरी, 1829 को न्यायूर्ति ग्रांट ने अपने आदेश में कहा कि पाण्ड्रंग के विरूद्ध कुर्की का आदेश जारी कर दिया जाये और गवर्नर एवं परिषद को यह निर्देशित किया जाये कि वे इसके वे जैसा ठीक समझे व्यक्ति लगाकर आदेश को कार्यान्वित कराये। उन्होंने यह भी निर्देश दिया कि राज्य के सचिव को भी पत्र भेजा जाए।

न्यायालय द्वारा इस प्रकार की कार्यवाही क्यों की गई और मामले के शपथ-पत्रों एवं कार्यवाहियों की प्रतियाँ भी संलग्न करें। इस पत्र एवं ओदश के प्रत्युत्तर में सचिव ने उत्तर दिया कि सरकार का यह आशय था कि पत्र दिनांक 3 अक्टूबर, 1829 में उल्लिखित कार्यपद्धति के अनुसार ही कार्यवाही की जाए जब तक कि इंग्लैण्ड से उच्च अधिकारियों से आदेश प्राप्त न हो जायें। इस उत्तर के पश्चात् महामहिम न्यायाधीश ग्रांट ने पहली अप्रैल, 1829 को घोषित किया कि न्यायालय ने अपने आपको सभी मामलों से हटा लिया है और वह तब तक न्यायाधीश के रूप में कोई कार्य नहीं करेंगे जब तक न्यायालय को यह आश्वासन नहीं मिल जाता है कि उसके प्रभुत्व का सम्मान किया जायेगा और उनकी प्रक्रिया का पालन किया जायेगा और प्रेजीडेन्सी सरकार द्वारा वैध ठहराया जायेगा। एशियाटिक रजिस्टर

खण्ड 28, पृष्ठ 351

[ अधिकार-पत्र, जिसके अन्तर्ग वर्तमान उच्च न्यायालयों का गठन किया गया और जो भारतीय उच्च न्यायालय अधिनियम, 1861 (विक्ट सी 104 का 24 व 25) के अन्तर्गत जारी किया गया, दिनांक के क्रमानुसार इस प्रकार है : कलकत्ता, 28 दिसम्बर, 1865; मद्रास 28 दिसम्बर, 1865; बम्बई 28 दिसम्बर, 1865; उत्तरी-पश्चिमी प्रान्त, 17 मार्च, 1866; अधिकार-पत्रों का विस्तृत विवरण स्टे. आर एण्ड ओ. खण्ड 4 पृ.82-131 पर है। उच्च न्यायालयों की न्यायिक सीमा के लिए देखें (आईबर्ट, भारत सरकार, पृ. 241-255 इस को देखे पृ. 387-405 (जन्मजात भारतीयों पर ब्रिटिश कानून लागू होना) पृ.सं. 406-463) (स्थानीय राज्यों में ब्रिटिश न्यायिक सीमा) ]