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यह अध्ययन अत्यधिक मूल्य का होता, यदि यह अस्पृश्यों व हिन्दू जाति की सामाजिक स्थिति का अध्ययन तुलनात्मक रूप में किया गया होता। लेकिन वह ऐसा नही है, एक ओर सामान्य धारणा एवं दूसरी ओर हिन्दू-जाति को दृष्टिगत रखकर अध्ययन अधिक आवश्यक था यदि इससे यह सिद्ध किया जाता कि अस्पृश्नीय अपनी अस्पृश्नीयता के कारण पीडि़त नहीं होते हैं। लेकन तुलना करने पर यह पाया जाता है कि प्रतिस्पर्धात्मक समाज, जैसा कि हिन्दू समाज की तुलना में अस्पृश्नीय अपनी आमदनी, अपने रोजगार और अन्य किसी रूप में पीडि़त होते हैं और यदि यह अहित अस्पृश्नीयता के अतिरिक्त किसी अन्य कारण से नहीं है तो यह स्वीकार करना होगा कि धर्मान्तरण के लिए मामला प्रबल था।
इसे स्पृश्यों और अस्पृश्यों भी लिखा जा सकता है। लेकिन इस सबके तुलनात्मक अध्ययन की प्रतीक्षा करनी होगी। इस प्रकार का अध्ययन किसी समय इस पुस्तक के लेखक या किसी अन्य व्यक्ति को करना पडे़गा यदि वर्तमान अध्ययन यह समझने हेतु उपयोगी व मार्गदर्शी होगा कि लेखक द्वारा निकाला गया निष्कर्ष क्या है और क्या स्पृश्नीयों एवं अस्पृश्नीयों की स्थिति में कोई भिन्नता है और यह भिन्नता अस्पृश्नीय जैसे सामाजिक कारण से है। इस प्रयास के प्रारम्भिक दौर के रूप में यह पुस्तक अभिनन्दनीय है।
| vEcsMdj | Col2 | Col3 | Col4 |
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कर्नाटक पब्लिशिंग हाउस, बम्बई, 1938