94. क्या गाँधी एक महात्मा है? - Page 468

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कपड़ों का त्याग कर देता है नंगा होकर घूमता है, लम्बे-लम्बे बाल रख लेता है, लोगों को गालियाँ देता है, गटर का गन्दा पानी पीता है, तो लोग उसके चरणों में गिर जाते हैं और उसकी पूजा करने लगते हैं। इन परिस्थितियों में यदि भारत में गाँधी महात्मा बन जाता है, तो इसमें कुछ कभी आश्चर्यजनक नहीं है। यदि इस प्रकार के कार्य किसी अन्य सभ्य राष्ट्र में व्यवहार में लाये गये होते तो लोग उस पर हँसे होते। एक सामान्य पर्यवेक्षक की नज़र में गाँधी का उपदेश अत्यंत कर्णप्रिय एवं प्रभावशाली प्रतीत होता है। सच्चाई एवं अहिंसा अत्यंत प्रभावशाली सिद्धांत हैं। गाँधी का दावा है कि वह सत्य एवं अहिंसा का प्रचार करते हैं एवं जनता इसे इतना पसंद करती है कि हज़ारों की संख्या में लोग उन्हें घेरे रहते हैं। मैं यह नहीं समझ सका कि वे ऐसा क्यों करते हैं? क्या यह सत्य नहीं है कि हजारों वर्ष पूर्व भगवान बुद्ध ने संसार को सत्य एवं अहिंसा का संदेश दिया था।

इस मामले में मौलिकता के लिए गाँधी को अज्ञानी, मूर्ख या सहज रूप से मंदबुद्धि के सिवाय कोई श्रेय नहीं देगा। इस उद्घोषणा में कुछ भी नया नहीं है कि मानव सभ्यता के संरक्षण के लिए सत्य एवं अहिंसा आवश्यक हैं। इसमें कुछ भी नया नहीं है जो गाँधी ने इस कहावत में जोड़ा है। जैसाकि मैं पूर्व में उल्लिखित कर चुका हूँ कि भगवान बुद्ध ने हजारों वर्ष पूर्व इन सिद्धांतों को सिखाया था। यदि गाँधी ने सत्य एवं अहिंसा के प्रयोग से उत्पन्न गंभीर समस्याओं पर कुछ प्रकाश डाला होता तो इससे उसकी महात्मापन के यश में वृद्धि होती तथा यह संसार सदैव उसका कृतज्ञ रहता। विश्व दो पहलुओं के हल की उत्सुकता से प्रतीक्षा कर रहा है जैसे ‘सत्य’ के महान् सिद्धांत को कैसे बनाए रखा जाए तथा किन परिस्थितियों में ‘हिंसा’ को एक सही कार्यवाही के रूप में माना जाये। भगवान बुद्ध ने उपदेश दिया था कि ‘सत्य’ एवं ‘अहिंसा’ के प्रति मानसिकता व्यावहारिक होनी चाहिये। जीसस क्राइस्ट ने इस प्रश्न का क्या उत्तर दिया होगा, दुर्भाग्य से हमारे पास यह जानने का कोई साधन नहीं है।

शायद पिलेट ने इस प्रश्न का उत्तर देने के लिए पर्याप्त समय नहीं दिया होगा। क्या गाँधी ने इस प्रश्न का उत्तर दिया है? मैंने इसे कहीं नहीं पाया है। यदि हम उसकी शिक्षाओं एवं उपदेशों का अध्ययन करते हैं तो हम पाते हैं कि उन्होंने अन्य व्यक्तियों की पूंजी पर व्यापार किया है अर्थात् दूसरों के कंधे पर बन्दूक चलाई है सत्य एवं अहिंसा उसकी मौलिक खोज नहीं है। जब मैं गम्भीरतापूर्वक गाँधी के चरित्र का अध्ययन करता हूँ तो मैं अत्यधिक आश्वस्त हो जाता हूँ कि उसके चरित्र में गम्भीरता एवं ईमानदारी की तुलना में छल कपट अधिक झलकता है। मेरे अनुसार उसकी सार्थकताओं की तुलना एक खोटे सिक्के से की जा सकती है। उसकी विनम्रता प्रसिद्ध अंग्रेजी उपन्यास ‘डेविड कॉपर फील्ड के चरित्रों में ‘यूनिया हीप’ की विनम्रता के समान है। उसने छल