94. क्या गाँधी एक महात्मा है? - Page 470

451

संशोधनों का विरोध किया था उनसे पं. मोतीलाल नेहरु और श्री जिन्ना, जिनके साथ श्री गाँधी द्वारा विश्वासघात किया गया था, ने इन सबकी जानकारी दी थी। नेहरु कमेटी की रिपोर्ट में किये जाने वाले प्रस्तावित संशोधनों का सुझाव श्री जिन्ना द्वारा दिया गया था और ये संशोधन उनके समुदाय के हित के लिए थे। लेकिन जब गाँधी को इस के बारे में पता चला तो उन्होंने सोचा कि पं. मोतीलाल नेहरु ने मुसलमानों को जितना वह मूल रुप से देना चाहते थे, की तुलना में बहुत अधिक दे दिया है।

पं. मोतीलाल नेहरु की प्रतिष्ठा कम करने के लिए उसने इन प्रसतावों का जोरदार ढंग से विरोध किया। गाँधी द्वारा किए गये इस कपट पूर्ण कार्य का परिणाम हिंदू-मुस्लिम विद्वेष है।

व्यक्ति जो अस्पृश्नीयों एवं मुसलमानों का दोस्त समझा जाता था, ने उन्हीं लोगों को उसी प्रयोजन में धोखा दिया, जिस प्रयोजन में वह उनका चेम्पियन होने का दावा करता है इससे मुझे अत्यधिक दुःख हुआ। एक पुरानी कहावत है जो इस समय खरी उतरती है ‘बगल में छुरी मुख में राम’। यदि ऐसे किसी व्यक्ति को महात्मा कहा जा सकता है तो गाँधी सही अर्थों में एक महात्मा हैं। मेरे अनुसार वह एक साधारण मोहनदास करमचन्द गाँधी से अधिक कुछ नहीं है।

चित्रा के सम्पादक ने जो माँग की थी मैंने उससे अधिक दे दिया है। चित्रा के पाठक जितना आत्म-सात कर सकते थे, मैंने अवश्य ही उससे अधिक बताया होगा।

यहाँ उद्धृत घटनाओं के अतिरिक्त दो अन्य बातें भी हैं जिन्हें मैं बताकर अपनी बात को समाप्त करूँगा। राणा डे, गोखले, अगरकर एवं तिलक तथा उनके द्वारा आरम्भ किये गये आन्दोलन का युग गाँधी के युग से भिन्न था। उनका युग ज्ञान का युग था। इस संबंध में बिल्कुल कोई सन्देह नहीं है। गाँधी युग को भारत का ‘तमो युग’ कहा जा सकता है। अगरकर तथा तिलक की राजनीति ईमानदारी और सच्चाई पर आधारित थी। यह थोथा चना बाजे घना वाली नहीं थी। लेकिन गाँधी की राजनीति थोथा चना बाजे घना वाली है। भारतीय शासन प्रणाली के इतिहास में यह राजनीति अत्यन्त कपटपूर्ण ह। गांधी राजनीति समाप्त करने और इसके स्थान पर भारतीय राजनीति में व्यावसायिकता लाने के लिए जिम्मेदार व्यक्ति था। राजनीति को उसके सदाचारों से विहीन कर दिया गया है। फैरिसीस के जीसस क्राइस्ट ने कहा है जब नमक ने अपना जायका खो दिया हो किसके साथ इसे नमकीन बनाया जाए। दूसरा एवं अत्यन्त महत्त्वपूर्ण प्रश्न यह है कि भारतीय सार्वजनिक जीवन से गाँधी की घातक सन्त प्रवृत्ति से कैसे छुटकारा पाया जाये? यदि भारत के हिन्दू इसे आज महसूस नहीं करते तो बाद में इससे छुटकारा पाने के लिए काफी समय लगेगा। अधिकतर भारतीय