452 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
नागरिक अशिक्षित, अज्ञानी एवं असभ्य हैं। इसमें लोगों का दोष नहीं है। समाज के कुछ विशेषाधिकार प्राप्त व्यक्तियों ने जानबूझ कर अधिकतर लोगों को अशिक्षित एवं अज्ञानी रखा है। यह वास्तविकता है कि पूर्णतया तर्क बुद्धि एवं शास्त्र दृष्टिकोण के विरुद्ध है अकेला कारण महात्मापन के चमत्कार के सम्माहेन प्रभाव को मिटा नहीं सकता। इन परिस्थितियों में, मैं कुछ सुझाव देना चाहूँगा। महात्मा के कार्यकलापों को समाप्त करने के लिए अन्य महात्माओं को भारतीय सार्वजनिक जीवन में सक्रिय रूप से भाग लेने हेतु आगे आना चाहिये तथा अपनी-अपनी निजी राजनीतिक इकाई गठित करनी चाहिये। भारत में महात्माओं की कोई कमी नहीं है। उपासनी बुवा, दादा महाराज, मेहर बाबा, नारायण बुवा केटगोनकर आदि कुछ विख्यात नाम हैं। अनेक सन्त एवं महात्मा भारत में रहते हैं। वे मासूम लोगों को मूर्ख बनाने एवं जाल में फंसाने की कला जानते हैं। यह सत्य है, कि उनके अनुयायियों की संख्या गाँधी जी के अनुयायियों से काफी कम है। लेकिन अक्षमता या असमर्थता ही इस का एक मात्र कारण नहीं हो सकता। उनके पास अपने हिन्दू जन समुदाय के उद्धार के साथ-साथ स्वंतत्रता प्राप्त करने की शक्ति एवं सामर्थ्य है। वे ये जानने में क्यों समर्थ नहीं हैं इसके कई कारण है। अपनी दोहरी नीति एवं कपटी चरित्र के कारण गाँधी ं जी सभी के लिए आध्यात्मिक एवं राजनीतिक आजादी प्राप्त करने के आश्वासन के द्वारा अनुयायी बनाने में सफल हुए हैं मुझे विश्वास है कि यदि उपासनी बुवा, नारायण महाराज आदि गाँधी जी की नीति अपना लें, तो निःसन्देह वे भी ऐसी इकाई स्थापित करने में सफल हो जायेंगे जो प्रभावी ढंग से गाँधी के अन्ध अनुयायियों का सामना कर सकते हैं। भारत की मुक्ति इसमें ही निहित है। देश में वर्तमान में काफी संख्या में पार्टियों का होना देश के लिये तो लाभकारी है। यदि इन लक्ष्यों एवं उद्देश्यों के साथ एक संगठन की स्थापना की जाती है तो यह उन्हीं उद्देश्यों को पूरा करने में सफल होगा, जैसाकि पुराणों की अप्सराओं द्वारा अपने शत्रुओं का संहार हेतु किया गया था और यदि यह घटित नहीं हुआ होता तथा यह संगठन प्रक्रियात्मक रहता है, तब भी इसकी विद्यमानता उपयोगी रहेगी। इस प्रकार से कम से कम फासिस्टवाद का घातक सम्प्रदाय जो चारों तरफ अपने पंख फैला रहा है, रोका जा सकेगा। मुझे विश्वास है कि यदि एक महात्मा आता है तथा सीधे ढंग से वर्णन करते हुये अपना चुनाव घोषणा पत्र रखता है तो वह मुक्ति प्राप्त कर सकता है तो शायद भारत बौद्धि क स्वतंत्रता प्राप्त कर लेगा। यह मज़ाक नहीं है। यहाँ किसी व्यक्ति की निन्दा या आलोचना करना नहीं है। मैं इसे पूर्ण गंभीरता के साथ लिख रहा हूँ।
क्या हिन्दू दादा महाराजा, मेहर बाबा या नारायण बुवा जैसे महात्माओं के विचारों में परिवर्तन करते हुए भारत सेवा का प्रयास करेंगे।
यह लेख चित्रा (मराठी) दीपावली विशेषांक नम्बर 1938 में सर्वप्रथम प्रकाशित हुआ था।