456 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
के साथ संयुक्त निर्वाचन क्षेत्र द्वारा।
(5) सेना में पर्याप्त प्रतिनिधित्व। सभी प्रदेशों में लोक सेवा आयोग स्थापित करने
पर बल दिया गया था, जिसके कार्य होंगे-
(क) सेवाओं मं इस प्रकार भर्ती की जाये ताकि सेवाओं में सभी समुदायों को उचित
एवं पर्याप्त प्रतिनिधित्व प्राप्त हो, एवं
(ख) किसी विशेष सेवा के संबंध में विभिन्न समुदायों के प्रतिनिधित्व की वर्तमान सीमा
के अनुसार रोज़गार में समय-समय पर प्राथमिकता को विनियमित करना।
(6) पक्षपातपूर्ण कार्यवाही या हितों की उपेक्षा के विरुद्ध निवारणात्मक कार्यवाही।
(7) विशेष विभागीय देखरेख।
(8) मंत्रिमण्डल में उनकी जनसंख्या के अनुसार उचित प्रतिनिधित्व।
अब हम बात करते हैं कि अस्पृश्यों की अन्य माँगों का क्या हुआ? अल्पसंख्यक समिति द्वारा गोलमेज़ सम्मेलन को प्रस्तुत की गई रिपोर्ट का हमें अवलोकन अवश्य करना चाहिए। मद सं. 16 एवं 18 से हमें जानकारी मिलती है कि दलित वर्ग अपने लिए अलग निर्वाचन क्षेत्र प्राप्त करने हेतु दृढ निश्चयी है। संक्षेप में, सर्वसम्मति से यह सहमति व्यक्त की गई थी कि अस्पृश्य भारत के राजनीतिक जीवन में पृथक घटक के रूप में मान्यता प्रदान किये जाने के पात्र हैं। यहाँ हमें यह नहीं भूलना चाहिए कि अस्पृश्यों की पृथक मान्यता के मुद्दे पर सर्वसम्मति से करार केवल भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस की अनुपस्थिति के कारण ही संभव हो सका था।
द्वितीय गोलमेज सम्मेलन का अवलोकन करते हुये हम पाते हैं कि कांग्रेस का इसमें पूर्ण प्रतिनिधित्व था। सम्मलेन को सफल बनाने के लिए सबकी नज़र कांग्रेस पर थी। दुर्भाग्य से श्री गाँधी को भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस का प्रतिनिधित्व करने हेतु चुना गया था। भारत के भाग्य का फैसला करने के लिए एक दुष्ट व्यक्ति को नहीं चुना जा सकता। उसने एक विचित्र व्यक्ति की तस्वीर प्रस्तुत की जो अनेक मामलों में सम्मेलन को आतंकित ऐसे मामले में हर प्रकार से विरोध करेगा जिसके समझौते को वह अपने सिद्धानत से छोटा मानेगा यद्यपि अन्यों को पक्षपातपूर्व कहेगा और अन्य मामलों के अनावश्यक महत्त्वपूर्ण मद्दों पर मौन रहेगा जिनको अन्य व्यक्ति सैद्धान्तिक मामला मानेंगे। 15 सितम्बर, 1931 को श्री गाँधी ने अपना पहला भाषण दिया जिसमें उसने कहा कि अस्पृश्यता की समस्या बिल्कुल नहीं है। उसने