97. कांग्रेस का अस्पृश्यों को हटाने का प्रयास - Page 477

458 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

दिखाया जो मुझे हाल ही में प्राप्त हुआ था, यह तार ऐसे व्यक्ति द्वारा भेजा गया था, जिसे मैं कभी भी नहीं मिला था, यह ऐसे स्थान से भेजा गया था जहाँ मैं कभी भी नहीं गया था। इतना ही नहीं सम्मेलन के दौरान मेरे पक्ष में अत्यधिक तार प्राप्त हुए, यह श्री गाँधी की हार थी। जो अब मौन रहने तथा माँगों की प्रत्यक्षता के सम्मुख अपयशकारी हार को स्वीकार करने के लिए मजबूर थे।

यह सामुदायिक समस्या का समाधान करने के लिये अल्पसंख्यक समिति के सभी प्रयासों के अंत की एक पुरानी कहानी है। यह कहना अतिशयोक्ति होगी, कि श्री गाँधी का गोलमेज़ सम्मेलन में जाने का मुख्य उद्देश्य अस्पृश्यों की विधिसम्मत माँगों का विरोध करना था। श्री गाँधी को मुस्लिम या सिखों के लिए पृथक निर्वाचन क्षेत्र हेतु आपत्ति नहीं होगी लेकिन जब अस्पृश्य अपनी अलग पहचान बनाये जाने के लिए प्रयास कर रहे हैं, तो उसने उसकी माँगों को बिल्कुल निष्प्रायोजित बताया। श्री गाधी के पास कोई तर्क नहीं था, उसका कोई सिद्धान्त नहीं था। यह उसकी ‘अन्तर्रात्मा की पीड़ा थी’ जो उसे नैतिक रूप से अस्पृश्यता के प्रति सद्भावना युक्त शब्द बोलने के लिए बाध्य कर रहे हैं। उसने उस कटु भाषा में मुसलमानों का विरोध करने की कभी हिम्मत नहीं दिखाई। वह कैसे कर सकता था? उसने अस्पृश्यों की माँगों के विरोध करने की हिम्मत केवल इसलिए की, क्योंकि उसे पूर्वानुमान था कि वे अस्पृश्यों जो हिन्दू जाति के मुफ्त के गुलाम थे, को दास-प्रथा से मुक्त कराया गया था, दूसरे शब्दों में इसका अर्थ है कि हिन्दू जाति को अवैतनिक बंधुआ मजदूरों से वंचित किया जाना था जिन्होंने अनन्तकाल से उनकी प्रतिष्ठा को बढ़ाया था।

यद्यपि कांग्रेस अपने अत्यधिक प्रतिनिधित्व स्वरूप का ढोल पीट रही थी, इस घटना ने स्पष्टतः दिखा दिया था कि कांग्रेस कुछ नहीं थी बल्कि यह हिन्दू जाति का दूसरा नाम है। इसी कारण से हम देखते हैं कि कांग्रेस अस्पृश्यों के शेष हिन्दू जाति से अलगाव के मुद्दे पर अधिक सतर्क थी। क्या इस आपत्ति को किसी अन्य संस्था द्वारा उठाया गया, इस पर विधि-सम्मत रूप में विचार किया जाना चाहिए था। लेकिन जब कांग्रेस अस्पृश्यों के पक्ष में बोलती है तो उसे अपना कौन-सा प्रयोजन सिद्ध करना होता है? क्या इस का यह अर्थ नहीं है कि कांग्रेस स्पष्टतः एक हिन्दू पार्टी है, अछूतों की समस्या वास्तव में हिन्दू जाति की समस्या थी एवं कांग्रेस एक हिन्दू संगठन नहीं था तब उसने इस समस्या में अपने आपको क्यों संलिप्त कर लिया जो उसके अपने अधिकार क्षेत्र में पूर्णतया बाह्य समस्या थी? वह केवल अस्पृश्यों को उनके विधि-सम्मत अधिकारों की स्वीकृति न देते हुए हज़ारों वर्षों तक अस्पृश्यों को लोरी सुनाकर करना चाहती है।