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उद्धार का अवसर बनाना चाहता है। यह समझ पाना बहुत कठिन है कि भारत के अवसर से क्या तात्पर्य है।
यदि इसका तात्पर्य यह है कि भारत अब अपनी अन्तर्निहित शक्ति से ब्रिटेन से अपनी शर्तों को मनवाने में सफल हो जाता है तो प्रत्येक व्यक्ति को यह स्वीकार कर लेना चाहिए कि “भारत का अवसर” केवल एक खोखला वाक्य है, जिसमें कोई माद्दा नहीं है। सविनय अवज्ञा का गांधीवादी तरीका बहुत थकाऊ है और हर कोई इसे दूसरे रूप में देखना चाहता है।
यदि इसका तात्पर्य यह है कि यह भारतीय लोगों को ब्रिटिश वर्चस्व से उनका उद्धार करने के लिए ग्रेट ब्रिटेन के किसी शत्रु देश को आमंत्रित करने का एक अवसर है तो यह सबसे बड़ा जाल है। यह अच्छी तरह जानते हुए कि मेहमान के यहाँ आकर रहने और फिर भारतीय लोगों का मेजबान बन जाने की पूरी संभावना है तो ऐसा कोई भी भारतीय जिसकी निर्णय शक्ति भावनाओं के बोझ तले न दबी हो, इस कदम को सुविचारित और विवेकपूर्ण नहीं कहेगा।
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कृपया, कोई नया आका नहीं
इंडिपेंडेंट लेबर पार्टी मानती है कि जहाँ तक निकट भविष्य की कल्पना का संबंध है, अपने कदमों को व्यावहारिक राजनीति के ठोस धरातल पर रखते हुए भारत के लिए ब्रिटिश राष्ट्रकुल के राष्ट्रों में बने रहना और उनमें समान भागीदारी का दर्जा हासिल करने का प्रयत्न करना ही उसके सर्वोत्तम विकल्प है।
उस दर्जे को हासिल करने की दिशा में काफी रास्ता पहले ही तय कर लिया गया है। अब जितना रास्ता बाकी है वह छोटा-सा है और पहुंच के भीतर है। भारत के किसी काल्पनिक मित्र देश द्वारा अपने उद्धार की आशा में इस अवसर को भी गंवा देना राष्ट्र के लिए चाहे राजनैतिक आत्महत्या नहीं, परन्तु मूर्खतापूर्ण कार्य होगा। यह कोई नहीं जानता कि नए आका की सरपरस्ती में भारत का हश्र क्या होगा। कोई भी विचारशील भारतीय अपने देशवासियों को ऐसी नीति अपनाने की सलाह नहीं देगा जिसका परिणाम इतना अव्यावहारिक और इतना अनिश्चित व
खतरनाक न हो।
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जर्मनी के साथ हो रहे इस युद्ध में ग्रेट ब्रिटेन से सहयोग करना जहाँ भारत के लोगों के हित में है, वहीं ब्रिटिश लोगों को भी यह समझ लेना चाहिए कि उनके भी भारत के प्रति कुछ कर्त्तव्य हैं, जिनका निर्वाह लम्बे समय तक स्थगित नहीं रखा जा सकता।