100. डॉ. बाबा साहेब अम्बेडकर का ‘मराठा मन्दिर’ को सन्देश - Page 482

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डॉ. बाबा साहेब अम्बेडकर का ‘मराठा मन्दिर’ को सन्देश

मैं अपने आपको यह विश्वास करने हेतु कभी भी प्रेरित नहीं कर सका कि मैं मराठा समुदाय को यह संदेश देने हेतु किसी रूप में योग्य हूँ कि उन्हें किन आदर्शों एवं उद्देश्यों का अनुसरण करना चाहिए। चूँकि मुझ पर मराठा के आयोजकों द्वारा दबाव डाला गया कि मराठा द्वारा अपने समुदाय की उन्नति के लिए जो कुछ चाहते हैं उस कार्य को उपयुक्त ढंग से करे, के संबंध में अपने विचार व्यक्त करूं, मैंने उनकी आकांक्षाओं के अनुरूप अपनी प्रतिक्रिया व्यक्त करने की सहमति दी।

मेरा यह विश्वास है कि यह मराठा ही नहीं बल्कि यह प्रत्येक पिछड़े समुदाय पर भी लागू होता है, कि यदि वे शोषण से बचना चाहते हैं तो राजनीति एवं शिक्षा-दों विषयों में अवश्य भाग लें। एक समुदाय अपना अस्तित्व तभी बनाये रख सकता है जब वह राज्य पर नियंत्रणकारी प्रभाव रखने में समर्थ है। लेकिन एक अल्पसंख्यक समुदाय समाज में अपना आधिपत्य तभी रख सकता है जब राज्य पर उसका प्रभाव हो। भारत में ब्राहा्रणों की स्थिति के उदाहरण से इसे बेहतर समझा जा सकता है। राज्य पर नियंत्रणकारी प्रभाव अत्यन्त आवश्यक है क्यों कि इनसे बिना राज्य की नीति को दिशा देना संभव नहीं है एवं इसकी प्रगति राज्य की नीति पर निर्भर करती है।

शिक्षित होना भी समान रुप से अनिवार्य है। लेकिन यह हमेशा याद रखना चाहिए कि विभिन्न समुदायों के मध्य पद प्रतिष्ठा के संघर्ष में क्या चीज़ देखी जाती है, यह केवल शिक्षा नहीं बल्कि उच्च शिक्षा का होना है। उच्च शिक्षा से मेरा तात्पर्य ऐसी शिक्षा से है जो एक मराठा को एक विशिष्ट महत्त्व के पद पर आसीन होने के योग्य बनाये-एक ऐसा पद जिस से वह सर्वेक्षण, नियंत्रण करने के साथ-साथ अपने समुदाय के व्यक्तियों का अन्याय से बचाव कर सके। यहाँ पुनः ब्राह्म्रण समुदाय का मामला केन्द्र बिन्दु में है। ब्राह्म्रण समुदाय सभी विषमताओं एवं सभी विरोधों के विरुद्ध अपने आपको बनाये रखने में समर्थ है, यह इस तथ्य के कारण संभव है कि सभी प्रतिष्ठित पदों पर ब्राहा्रण आसीन हैं।

यह मेरे अपने विचार हैं, मैं यह अवश्य कहूँगा कि मराठा मन्दिर अपने समुदाय