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तब तक न ठहरो जब तक अस्पृश्य पुरुषार्थ न प्राप्त कर ले
(डॉ. अम्बेडकर का जय भीम के पाठकों को संदेश)
‘‘आपने मुझे अपने 55वें जन्म दिन पर आपके विशेषांक हेतु संदेश भेजने के लिये
कहा है। यह एक दुर्भाग्यपूर्ण तथ्य है कि भारत में राजनीतिक नेताओं को पैगम्बरों
के समतुल्य माना जाता है। विदेशों में लोग अपने पैगम्बरों का जन्मदिन मनाते हैं।
यह केवल भारत में ऐसा होता है जहाँ पैगम्बरों के साथ-साथ राजनेताओं दोनों का
जन्मदिन मनाया जाता है। यह खेद की बात है कि यहाँ ऐसा होता है। व्यक्तिगत
रूप में मुझे अपना जन्मदिन मनाना पसन्द नहीं है। मैं आवश्यकता से अधिक
लोकतांत्रिक हूँ मैं व्यक्ति पूजा को प्रजातंत्र को पथभ्रष्ट करने वाला मानता हूँ। एक
नेता के लिए श्रद्धा, प्यार, आदर एवं सम्मान, यदि वह उनका पात्र है, स्वीकार्य है
तथा नेता एवं अनुयायियां, दोनों के लिए उचित है। लेकिन नेता की पूजा किसी भी
रूप में स्वीकार्य नहीं है। यह दोनों का नैतिक पतन करती है। लेकिन मैं इसे सभी
मुद्दों से अलग मानता हूँ। यदि एक बार नेता को पैगम्बर के समकक्ष मान लिया
जाता है, तो वह अवश्य ही पैगम्बर की भूमिका निभायेगा तथा वह अपने अनुयायियों
को पैगम्बर की भांति सन्देश देगा।
मैं अस्पृश्यों को क्या संदेश दे सकता हूँ? मैं उन्हें कोई संदेश नहीं दे सकता,
लेकिन मैं उन्हें ग्रीक पुराण से एक कथा सुना सकता हूँ तथा नैतिकता के संबंध में
बता सकता हूँ। यह कहानी ग्रीक देवी डीमीटर को संबोधित स्तुति-गान से संबंधित
है। डीमीटर के स्तुति गान में बताया गया है कि महान् देवी कैसे अपनी पुत्री की
खोज में भटकते हुए कीलियोज के महल में पहुँची। एक दीन-हीन धाय के वेश
में किसी ने भी देवी को नहीं पहचाना एवं रानी मीटोनेरिया ने उसे अपने नवजात
शिशु डीमोफून जो कालान्तर में टिप्लटोलमिस के नाम से जाना गया, की देखभाल
का कार्य सौंप दिया।
प्रतिदिन सायं जब घर के सदस्य सो रहे होते तो डीमीटर डीमोफून को उसके