101. तब तक न ठहरो जब तक अस्पृश्य पुरुषार्थ न प्राप्त कर ले - Page 485

466 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय

आरामदायक पालने से निर्दयतापूर्वक उठाकर बंद कमरे में ले जाती उसे नंगा कर अंगारों पर लिटा देती लेकिन वास्तविकता में प्रेम एवं इच्छा द्वारा प्रेरित होकर अन्ततः उसे देवत्व की स्थिति में लाना चाहती थी। बालक डीमोफून जलते कोयलों की तपन को सहन करता। उसने दिव्य परीक्षा से शक्ति संग्रहित की। उसमें अलौकिकता, अद्भुतशक्ति और चमत्कारिक गुण झलकने लगे। पौराणिक कथा के अनुसार मीटोनेरिया व्याकुल हो गई एवं एक दिन सायं अचानक कमरे में आ गई जहाँ पर यह प्रयोग चल रहा था एवं अपने भ्रामक भय से बच्चे को अलौकिकता प्रदान करने वाली देवी को एक और धकेलते हुए बच्चे को अंगारों से उठा लिया और इसके परिणामस्वरूप उसने बच्चे को बचा लिया परन्तु एक अलौकिक पुरुष और अन्ततः ईश्वर को खो दिया।

यह कहानी हमें क्या शिक्षा देती है? मेरे विचार से यह हमें शिक्षा देती है कि महानता केवल संघर्ष एवं बलिदान से ही प्राप्त की जा सकती है। अग्नि परीक्षा से गुजरे बगैर ने तो पुरुषत्व एवं न ही देवत्व प्राप्त किया जा सकता है। अग्नि शुद्ध करती है, अग्नि शक्तिशाली बनाती है, यही कार्य संघर्ष एवं यातना देते हैं। उत्पीडि़त व्यक्ति तब तक महानता प्राप्त नहीं कर सकता, जब तक वह संघर्ष एवं यातना के लिए अपने आपको तैयार नहीं कर लेता। उसे अपने भविष्य के निर्माण हेतु अपने सुखों एवं वर्तमान की आवश्यकताओं का बलिदान करने हेतु सदैव तत्पर रहना चाहिये। बाइबल के अनुसार जीवन की दौड़ के लिए सभी को बुलाया जाता है लेकिन चुना केवल कुछ को ही जाता है। क्यों कारण सुस्पष्ट है? अधिकतर उत्पीडि़त जीवन की इस दौड़ में महानता प्राप्त करने में असफल रह जाते हैं क्योंकि न तो उन के पास साहस होता है एवं न ही दृढ़ निश्चय जिससे वह अपने भविष्य के लिए अपनी वर्तमान की खुशियों का परित्याग कर दें।

क्या इस कथा में दिये गये सन्देश से बेहतर एवं महान कोई संदेश हो सकता है? मैं एक बता सकता हूँ। मेरे विचार से अस्पृश्यों के लिये यह बेहतर एवं अत्यन्त उपयुक्त संदेश है। मैं उनके संघर्षों एवं भावनाओं से परिचित हूँ। मैं जानता हूँ कि स्वतंत्रता के अपने संघर्ष में उन्होंने मुझ से अधिक यातनायें सही हैं। इस सब के साथ, मैं उन्हें कोई अन्य संदेश नहीं दे सकता। मेरा सन्देश है संघर्ष एवं और अधिक संघर्ष, यातना तथा और अधिक यातना है। इन बलिदानों या यातनाओं की गणना किये बगैर-संघर्ष एवं केवल संघर्ष है जिससे उनको मुक्ति मिलेगी। उनको और कोई मुक्ति नहीं दिला सकता।

अस्पृश्यों को उन्नति एवं प्रतिरोध के लिये सामूहिक इच्छा शक्ति विकसित करन