101. तब तक न ठहरो जब तक अस्पृश्य पुरुषार्थ न प्राप्त कर ले - Page 486

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होगी तथा अपने कार्य की प्रतिष्ठा में विश्वास रखने के साथ-साथ अपने लक्ष्य की प्राप्ति के लिए दृढ़ निश्चय का विकास करना होगा। उनका कार्य इतना महान् है एवं उद्देश्य इतना उत्कृष्ट है इसलिए अस्पृश्य के रूप में उन्हें प्रार्थना में सम्मिलित होकर यह गाना चाहिये : ‘‘वे सौभाग्यशाली हैं जो उनके उत्थान के लिए कार्य करने के लिए जीवित हैं जिनके मध्य वे जन्में हैं। वे सौभाग्यशाली हैं जो अपनी युवावस्था, अपनी आत्मा और शरीर की शक्ति और अपना सर्वस्य दासता के विरोध के प्रति चलाये जा रहे अभियान में तेजी लाने की दिशा में न्यौछावर करने के लिए दृढ़-संकल्प हैं, सौभाग्यशाली हैं वे जिन्होंने निश्चय किया है कि अच्छा हो, बुरा हो, कड़कती धूप हो, अन्धड़-तूफान हो, यश मिले, अपयश मिले-वे तब तक नहीं रुकेंगे जब तक अस्पृश्यों को पूर्ण रूप से उनका पौरुष प्राप्त नहीं हो जाता।’’

जय भीम, मद्रास, डॉ. अम्बेडकर के जन्मदिवस पर विशेषांक 13 अप्रैल, 1947