468 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
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‘बौद्ध धर्म का सार’ की प्रस्तावना
इस पुस्तक का लेखक प्रो. पी. लक्ष्मी नारासु था। जब कि मुझे इस पुस्तक का
लोकार्पण करते हुए हार्दिक प्रसन्नता हुई। मैं मानता हूँ कि मैं लेखक से नहीं मिला
था और उसके व्यक्तिगत जीवन के बारे में बहुत कम जानकारी थी। मैं उसके
व्यक्तिगत जीवन तथा उसके साहित्यिक कार्य के बारे में जितना विवरण प्राप्त कर
सका, उसे प्राप्त करने का प्रयास किया। इस कार्य हेतु मैंने स्रोत रूप में पट्टाभि
सीतारमैया को चुना। वह प्रो. नारसु को व्यक्तिगत रूप से जानता था तथा उसका
मित्र था। डा. पट्टाभि द्वारा दी गई जानकारी के आधार पर मैं प्रो. नारासु के जीवन
के कुछ मुख्य तथ्यों को निम्न प्रकार से प्रस्तुत कर रहा हूँ।
प्रो. पी. लक्ष्मी नारासु, स्नातक (बी.ए.) पिछली शताब्दी का एक प्रतिभाशाली व्यक्ति
था। वह मद्रास क्रिश्चियन कालेज से भौतिकी में स्नातक था। एक शिक्षक एवं निर्देशक
होते हुए वे सन् 1897 तक सहायक प्राध्यापक (प्रोफेसर) के पद पर प्रतिष्ठित हो
गये। भौतिकी के स्थाई प्राध्यापक प्रो. मोफेट के अवकाश पर होने के कारण उनकी
अनुपस्थिति में इन्हें स्नातक की कक्षाओं हेतु भौतिकी एवं रसायन का पूर्ण प्रभार सौंप
दिया। प्रो. मोफेट, जो अपरिपक्व युवक थे, को प्रो. नारासु के ऊपर प्रोफेसर के पद
पर नियुक्त कर दिया गया जबकि प्रो. नारासु बेतार के क्षेत्र में भौतिकी में पहले से
उपाधि प्राप्त कर चुके थे, यह उपाधि उन्होंने जीवन की प्रारम्भिक अवस्था में पिछली
शताब्दी के नब्बे के दशक में प्राप्त कर ली थी। वर्ष 1898-99 के दौरान प्रो. नारासु
जिनको उन दिनों इसी नाम से बुलाया जाता था, भौतिकी एवं रसायन हेतु स्नातक
एवं स्नातकोत्तर परीक्षाओं के परीक्षक के रूप में कार्यरत थे। प्रो. नारासु विशेष रूप
से डायनामिक में दक्ष थे, जब एक बार डायनामिक के प्रश्न की सत्यता पर परिवर्तन
प्रश्न उठा तो एक गर्ममिजाज अंग्रेज प्रो. विल्सन, जो प्रेजीडेन्सी कालेज, मद्रास में
रसायन का प्रोफेसर तथा भौतिकी एवं रसायन में परीक्षकों के बोर्ड का अध्यक्ष था,
ने डाइनामिक की किसी समस्या के संबंध में प्रो. नारासु द्वारा अभिव्यक्त विचारों