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की सत्यता संबंधी प्रश्न किया तो प्रो. नारासु ने उनकी चुनौती तत्काल स्वीकार कर ली। अंहकारी विल्सन ने पूछा, ‘‘मि. नारासु क्या तुम मुझे पढ़ाना चाहते हो? जिसके प्रत्युत्तर में प्रो. नारासु ने समस्या को हल करने के उपरान्त प्रत्युत्तर दिया- ‘‘मुझे प्रसन्नता है कि मैं डाइनामिक में प्रो. विल्सन को कुछ पढ़ा रहा हूँ’’। यह घटना इसके घटित होने के पचास वर्ष के उपरान्त भी हमारे लिए रुचिकर है, क्योंकि यह दर्शती है कि प्रो. नारासु एक रुढि़भंजक थे। प्रो. नारासु एक समाज सुधारक थे। उसने अपनी अधिकतम सकर्थता के साथ जातियों के विरुद्ध लड़ाई की एवं 18वीं शताब्दी के नौवें दशक में हिन्दूधर्म में इसके अत्याचारों के विरुद्ध विद्रोह को बुलन्द किया। वह बौद्ध धर्म का महान् अनुयायी था एवं इस विषय पर हर सप्ताह व्याख्यान भी देते थे। वे अपने विद्यार्थियों में अत्यधिक लोकप्रिय थे जिनके ऊपर वह अपने जादुई व्यक्तित्व का प्रभाव डालते थे ताकि उनके दृष्टिकोण एवं दूरर्शिता में विस्तार हो। उनकी आत्म-सम्मान की भावना व्यक्तिगत व राष्ट्रीय दोनों ऊँचे दर्जे की थी तथा वे अहंकारी नहीं थे। अपने यूरोपियन सहकर्मियों के साथ स्व-श्रेष्ठता के बोध की भावना भी नहीं रखते थे, जिसको वे सदैव छात्रवृत्ति का अपना देय देने को तत्पर रहते थे, लेकिन उनसे बेइज्जत नहीं होना चाहते थे।
प्रो. नारासु ने शिक्षाविद् के रूप में सामान्य एवं व्यापक रुप से ख्याति प्राप्त करने में अधिक समय नहीं लिया, कि वह पण्डिचापा कालेज के प्रधानाध्यापक पद पर पदोन्नत कर दिये गये।
प्रो. नारासु एक उच्च जन-भावना संजोये नागरिक थे जिन्होंने ‘‘राष्ट्रीय निधि एवं औद्योगिक संघ’’ के गठन में महत्वपूर्ण भूमिका अदा की। इसके अंतर्गत छुट-पुट दान एकत्रित किया जाता था, इस राशि से उच्च तकनीकी शिक्षा के लिए विदेश जाने के इच्छुक विद्यार्थियों को सहायता प्रदान की जाती थी। जापान एक ऐसा देश था जो युवाओं को आकर्षित करता था और यह उनकी महत्त्वाकांक्षा थी, कि लघु उद्योगों एवं उत्पादनकर्ताओं की तकनीकी को सीखा जाए विशेष रूप से साबुन बनाना, ईनेमल एवं पेंट उत्पादन एवं इसी प्रकार के अन्य उत्पाद। लेकिन प्रोफेसर का एक दोष यह था कि वह समाज सुधारक थे। बौद्ध धर्म में उन्होंने आत्मशक्ति प्राप्त की। वह जाति प्रथा, छोटी उम्र में विवाह, विधवा विवाह निषेध जैसी बुराइयों को महसूस करने वाले प्रारंभिक व्यक्तियों में से एक थे एवं उस समय इनको सुधार क्षेत्र में कार्य के लिए पारितोषिक हेतु चुना गया था क्यांकि इनका एक भाई एक विधवा से विवाह कर वास्तविक रूप से समाज सुधारक बन गया था। यह वह युग था, जब ईसाई मिशनरी न केवल समाज सुधार आन्दोलन का अनुमोदन कर रहे थे बल्कि इसका ज़ोरदार समर्थन भी कर रहे थे एवं रूढि़वादी हिन्दुवाद एवं ईसाई मत में परिवर्तन हेतु समझौते