470 बाबासाहेब डॉ. अम्बेडकर संपूर्ण वाघ्मय
का मार्ग अपना रहे थे। इनके दृष्टिकोण में परिवर्तन करने में ज्यादा समय नहीं लगा एवं ऐसे प्रगतिशील आन्दोलनों को धर्मान्तरण की वास्तविक बाधा के रूप में देखा जाने लगा। प्रो. नारासु 19वीं शताब्दी का नायक था जिसने देशप्रेम के उत्साह से यूरोपियन अहंकार, रूढि़भंजक जोश के साथ रूढि़वादी हिन्दुवाद, राष्ट्रवादी दृष्टिकोण से वाममार्गी ब्राहा्रणों और तर्कवादी दृष्टिकोण से आक्रमक ईसाई मत से संघर्ष महान् बुद्ध की शिक्षाओं में अपने दृढ़-विश्वास से प्रेरित होकर किया।
वर्तमान में भारत के विभिन्न भागों से अधिकतर व्यक्ति मुझे बौद्ध धर्म पर एक अच्छी पुस्तक की संस्तुति करने के लिये कह रहे हैं। उनकी इच्छाओं के प्रत्युत्तर में मुझे प्रो. नारासु की पुस्तक का सुझाव देने में कोई संकोच नहीं हो रहा है। मेरे विचारानुसार अब तक उपलब्ध सभी पुस्तकों में से बौद्ध धर्म पर यह एक सर्वोत्तम पुस्तक है। दुर्भाग्यवश यह पुस्तक काफी से उपलब्ध नहीं है। अतः मैंने इसे पुनर्मुद्रित कराने का निर्णय लिया ताकि उन व्यक्तियों की इच्छा पूर्ण हो जिनकी बौद्ध धर्म की शिक्षाओं में रुचि है, ताकि उनके हाथों में ऐसी पाठ्यपुस्तक हो जो इसकी विस्तृत व्याख्या में सुबोध होने के साथ-साथ प्रतिपदित रूप से पूर्ण है। मैं पुरानी फर्म वरदाचारी एण्ड कंपनी, मद्रास के प्रतिनिधियों का आभार अवश्य व्यक्त करता हूँ जिनके पास पुस्तक के पुनर्मुद्रण की अनुमति हेतु मूल प्रकाशन का स्वत्वाधिकार है।
इस पुनर्मुद्रण की प्रस्तावना लिखने में मेरा आशय कुछ आलोचनाओं का उत्तर देने में है, जो पूर्व एवं वर्तमान में विरोधियों द्वारा बुद्ध की शिक्षाओं के प्रति की गई थी। मैंने इस आशय को दो कारणों से छोड़ दिया है। सबसे पहले तो मेरा स्वास्थ्य मुझे इस कार्य को करने की अनुमति नहीं दे रहा है। दूसरा, मैं स्वयं बुद्ध के जीवन पर कार्य कर रहा हूँ एवं मेरा विचार है कि मैं इस मामले में किसी अन्य व्यक्ति की पुस्तक की प्रस्तावना की तुलना में अपनी पुस्तक में इस मामले का समाधान अधिक न्यायोचित रूप से कर सकूँगा। मैंने इस निर्णय को विशेष रूप से इसलिये लिया है क्योंकि मैं आश्वस्त हूँ, कि प्रो. नारासु की पुस्तक के पाठक किसी भी प्रकार से मेरे इस निर्णय से निराश नहीं होंगे।
| vEcsMdj | Col2 | Col3 | Col4 |
|---|---|---|---|
| vEcsMd |
राजगृह
हिन्दू कालोनी, दादर
बम्बई-14
10 मार्च 1948 (प्रथम संस्करण 1907, द्वितीय संस्करण 1912) टक्कर एण्ड कम्पनी लि. रामपार्ट रो, बम्बई द्वारा तृतीय संस्करण