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भारत की प्राचीन घटनाओं ने निराशावाद को जन्म दिया
राष्ट्र रक्षा के वैदिक साधन
‘स्वामी वेदानन्द तीर्थ द्वारा’
प्रस्तावना
मुझे स्वामी वेदानन्द की पुस्तक की प्रस्तावना लिखने हेतु कहा गया है। कार्य के दबाव में कारण मैंने लेखक के अनुरोध को स्वीकार करने से इन्कार कर दिया। लेकिन वह मुझसे कुछ शब्द लिखने का आग्रह कर रहे हैं। तो मैं ऐसा करने हेतु सहमत हो गया। लेखक का तर्क यह है कि स्वतंत्र भारत को वेदों द्वारा जो धार्मिक सिद्धान्त की शिक्षा दी गई है उसे धर्म के रूप में स्वीकार कर लेना चाहिए। ये सिद्धान्त वेदों में अलग-अलग स्थानों पर उल्लिखित हैं एवं इनको इस पुस्तक में एक स्थान पर संग्रहित किया गया है। मैं नहीं जानता कि यह पुस्तक नये भारत का धार्मिक सिद्धान्त बन जायेगा। लेकिन मैं यह कह सकता हूँ कि यह पुस्तक ने केवल प्राचीन आर्यों की धार्मिक पुस्तकों में से लिये गये कथनों को एक उत्कृष्ट संग्रह है, बल्कि इनमें प्राचीन आर्यों के मध्य प्रचलित विचारों एवं गतिशीलता के उत्साह को हृदयग्राही ढंग से प्रस्तुत किया गया है। पुस्तक में जो कुछ दर्शाया गया है उसमें ऐसा कुछ नहीं बताया गया है कि प्राचीन आर्यों में निराशावाद प्रचलित था जो आधुनिक हिन्दुओं में व्याप्त है। यह पुस्तक और अधिक उच्च मूल्यों की होती यदि लेखक ने इस बात पर विचार किया होता कि भारत के प्राचीन काल की स्वीकारात्मकता एवं आशावाद ने कालान्तर में निराशावाद को क्यों जन्म दिया। मैं आशा करता हूँ कि लेखक इस समस्या पर बाद में शोध करेगा। फिलहाल यह हमारी जानकारी के लिये कोई छोटा योगदान नहीं है यह सैद्धान्तिक विश्व एक मायावी है, एक नया आविष्कार है। इस दृष्टिकोण से मैं इस पुस्तक की सराहना करता हूँ।
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बी.आर. अम्बेडकर
स्वामी वेदानन्द तीर्थ (1892-1956) राष्ट्र रक्षा के वैदिक साधन-1948